हि

अध्याय 18 · 13 / 74

18.13-14

पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।
सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥ १३ ॥
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥ १४ ॥

पञ्च—पाँच; एतानि—ये सब; महा-बाहो—हे महाबाहु; कारणानि—कारण; निबोध—भली-भाँति समझो; मे—मुझसे; सांख्ये—वेदों में; कृतान्ते—कर्म के पश्चात्; प्रोक्तानि—कहे गए; सिद्धये—सिद्धि हेतु; सर्व—समस्त; कर्मणाम्—कर्मों के; अधिष्ठानम्—स्थान; तथा—भी; कर्ता—कर्ता; करणम् च—तथा करण; पृथक्-विधम्—विभिन्न प्रकार के; विविधाः च—नाना प्रकार के; पृथक्—पृथक्-पृथक्; चेष्टाः—प्रयत्न; दैवम्—परमेश्वर; च—भी; एव—निश्चय ही; अत्र—यहाँ; पञ्चमम्—पाँचवाँ।

हे महाबाहु अर्जुन, मुझसे उन पाँच कारकों के विषय में जानो जो समस्त कर्म की सिद्धि करते हैं। सांख्य-दर्शन में इन्हें कर्म का स्थान, कर्ता, इन्द्रियाँ, प्रयत्न तथा अन्ततः परमात्मा घोषित किया गया है।

यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि जब किसी भी सम्पन्न कर्म की कोई-न-कोई प्रतिक्रिया अवश्य होती है, तो कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति कर्म की प्रतिक्रियाओं का कष्ट अथवा भोग कैसे नहीं भोगता? यह कैसे सम्भव है, यह दर्शाने हेतु भगवान् वेदान्त-दर्शन को उद्धृत कर रहे हैं। वे कहते हैं कि समस्त कर्मों के तथा प्रत्येक कर्म में सफलता के पाँच कारण होते हैं, और मनुष्य को इन पाँच कारणों को जानना चाहिए। सांख्य का अर्थ है ज्ञान का स्कन्ध, और वेदान्त समस्त प्रमुख आचार्यगण द्वारा स्वीकृत ज्ञान का अन्तिम स्कन्ध है। शंकर भी वेदान्त-सूत्र को इसी रूप में स्वीकार करते हैं। अतएव ऐसे प्रमाण से परामर्श करना चाहिए।

जैसा कि गीता में कहा गया है, “सर्वस्य चाहं हृदि,” परम संकल्प परमात्मा में निहित है। वे ही सबको कुछ निश्चित कर्मों में प्रवृत्त करते हैं। उनके भीतर से प्राप्त निर्देशन के अधीन किए गए कर्म कोई प्रतिक्रिया उत्पन्न नहीं करते, न तो इस जीवन में और न मृत्यु के पश्चात् के जीवन में।

कर्म के करण इन्द्रियाँ हैं, और इन्द्रियों के माध्यम से आत्मा विविध प्रकार से कर्म करती है, तथा प्रत्येक कर्म हेतु एक भिन्न प्रयत्न होता है। किन्तु मनुष्य के समस्त कर्म परमात्मा की इच्छा पर निर्भर करते हैं, जो हृदय के भीतर मित्र रूप में विराजमान हैं। परमेश्वर परम कारण हैं। ऐसी परिस्थितियों में, जो हृदय के भीतर स्थित परमात्मा के निर्देशन में कृष्णभावनामृत में कर्म कर रहा है, वह स्वाभाविक रूप से किसी कर्म से बँधता नहीं। जो पूर्ण कृष्णभावनामृत में स्थित हैं, वे अन्ततः अपने कर्मों के लिए उत्तरदायी नहीं होते। सब कुछ परम संकल्प, परमात्मा, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् पर निर्भर है।