अध्याय 18 · 14 / 74
18.15
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः ।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥ १५ ॥
शरीर—शरीर; वाक्—वाणी; मनोभिः—मन के द्वारा; यत्—जो कुछ; कर्म—कर्म; प्रारभते—आरम्भ करता है; नरः—मनुष्य; न्याय्यम्—उचित; वा—अथवा; विपरीतम्—विपरीत; वा—अथवा; पञ्च—पाँच; एते—ये सब; तस्य—उसके; हेतवः—कारण।
मनुष्य शरीर, मन अथवा वाणी से जो भी उचित या अनुचित कर्म करता है, वह इन्हीं पाँच कारकों से उत्पन्न होता है।
इस श्लोक में “उचित” तथा “अनुचित” शब्द अत्यन्त सार्थक हैं। उचित कर्म वह कर्म है जो शास्त्रों में निर्धारित निर्देशों के अनुसार किया जाता है, और अनुचित कर्म वह कर्म है जो शास्त्रीय विधानों के सिद्धान्तों के विरुद्ध किया जाता है। किन्तु जो भी किया जाता है, उसके पूर्ण सम्पादन हेतु इन पाँच कारकों की आवश्यकता होती है।