अध्याय 18 · 3 / 74
18.3
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥ ३ ॥
त्याज्यम्—त्याग देना चाहिए; दोषवत्—दोष के रूप में; इति—इस प्रकार; एके—एक वर्ग; कर्म—कर्म; प्राहुः—कहा; मनीषिणः—महान् विचारकों का; यज्ञ—यज्ञ; दान—दान; तपः—तप; कर्म—कर्म; न—कभी नहीं; त्याज्यम्—त्यागने योग्य है; इति—इस प्रकार; च—निश्चय ही; अपरे—अन्य जन।
कुछ विद्वज्जन घोषित करते हैं कि सभी प्रकार के सकाम कर्मों का त्याग कर देना चाहिए, किन्तु अन्य ऐसे ऋषि भी हैं जो यह मानते हैं कि यज्ञ, दान तथा तप के कर्म कभी त्यागे नहीं जाने चाहिए।
वैदिक साहित्य में अनेक ऐसे कर्म हैं जो विवाद के विषय हैं। उदाहरणार्थ, कहा जाता है कि यज्ञ में पशु का वध किया जा सकता है, तथापि कुछ लोग यह मानते हैं कि पशुवध पूर्णतया निन्दनीय है। यद्यपि वैदिक साहित्य में यज्ञ में पशुवध की अनुशंसा की गई है, किन्तु उस पशु को मरा हुआ नहीं माना जाता। यज्ञ का प्रयोजन उस पशु को नवीन जीवन प्रदान करना है। कभी-कभी यज्ञ में मारे जाने के पश्चात् पशु को नवीन पशु-जीवन प्राप्त होता है, और कभी-कभी उस पशु को तत्काल मनुष्य-योनि में उन्नत कर दिया जाता है। किन्तु ऋषियों में भिन्न-भिन्न मत हैं। कुछ कहते हैं कि पशुवध का सदा परिहार करना चाहिए, और अन्य कहते हैं कि किसी विशिष्ट यज्ञ हेतु वह उचित है। यज्ञ-कर्म विषयक इन समस्त भिन्न मतों को अब भगवान् स्वयं स्पष्ट कर रहे हैं।