अध्याय 18 · 20 / 74
18.21
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् ।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ॥ २१ ॥
पृथक्त्वेन—विभाजन के कारण; तु—किन्तु; यत् ज्ञानम्—जो ज्ञान; नाना-भावान्—अनेकविध स्थितियों को; पृथक्-विधान्—भिन्न-भिन्न रूप से; वेत्ति—जो जानता है; सर्वेषु—समस्त; भूतेषु—जीवों में; तत् ज्ञानम्—वह ज्ञान; विद्धि—जानना चाहिए; राजसम्—रजोगुणी।
जिस ज्ञान से भिन्न-भिन्न प्रकार का जीव भिन्न-भिन्न शरीरों में निवास करता हुआ देखा जाता है, उसे रजोगुणी ज्ञान जानो।
यह धारणा कि भौतिक शरीर ही जीव है और शरीर के विनाश के साथ ही चेतना भी नष्ट हो जाती है—रजोगुणी ज्ञान कहलाती है। उस ज्ञान के अनुसार विभिन्न प्रकार की चेतना के विकास के कारण शरीर एक-दूसरे से भिन्न होते हैं, अन्यथा चेतना को प्रकट करने वाली कोई पृथक् आत्मा नहीं है। शरीर ही आत्मा है, और इस शरीर से परे कोई पृथक् आत्मा नहीं है। ऐसे ज्ञान के अनुसार चेतना क्षणिक है। अथवा कोई व्यष्टि-आत्माएँ नहीं हैं, अपितु एक सर्वव्यापी आत्मा है, जो ज्ञान से परिपूर्ण है, और यह शरीर क्षणिक अज्ञान का प्रकटीकरण है। अथवा इस शरीर से परे कोई विशेष व्यष्टि अथवा परमात्मा नहीं है। ऐसी समस्त धारणाएँ रजोगुण की उपज मानी जाती हैं।