अध्याय 18 · 21 / 74
18.22
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् ।
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥
यत्—जो; तु—किन्तु; कृत्स्नवत्—सर्वस्व रूप में; एकस्मिन्—एक में; कार्ये—कर्म में; सक्तम्—आसक्त; अहैतुकम्—बिना किसी कारण के; अतत्त्व-अर्थवत्—यथार्थता से रहित; अल्पम् च—तथा अत्यन्त अल्प; तत्—वह; तामसम्—तमोगुण में; उदाहृतम्—कहा जाता है।
और जिस ज्ञान से मनुष्य एक प्रकार के कर्म में सर्वस्व समझकर आसक्त रहता है, जो सत्य के ज्ञान से रहित है, तथा जो अत्यन्त अल्प है, उसे तमोगुणी कहा जाता है।
सामान्य मनुष्य का “ज्ञान” सदा तमोगुण अथवा अज्ञान में रहता है, क्योंकि बद्ध जीवन में प्रत्येक जीव तमोगुण में ही जन्म लेता है। जो मनुष्य अधिकारियों अथवा शास्त्रीय आदेशों के माध्यम से ज्ञान विकसित नहीं करता, उसका ज्ञान शरीर तक ही सीमित रहता है। उसे शास्त्र के निर्देशों के अनुसार कर्म करने की चिन्ता नहीं होती। उसके लिए धन ही ईश्वर है, और ज्ञान का अर्थ है शारीरिक माँगों की पूर्ति। ऐसे ज्ञान का परम सत्य से कोई सम्बन्ध नहीं होता। यह कमोबेश साधारण पशुओं के ज्ञान के समान है—खाने, सोने, रक्षा करने तथा मैथुन करने का ज्ञान। ऐसे ज्ञान को यहाँ तमोगुण की उपज बताया गया है। दूसरे शब्दों में, इस शरीर से परे आत्मा सम्बन्धी ज्ञान सत्त्वगुणी ज्ञान कहलाता है, सांसारिक तर्क तथा मनोधर्म के बल पर अनेक सिद्धान्तों एवं मतों को उत्पन्न करने वाला ज्ञान रजोगुण की उपज है, और केवल शरीर को सुखी रखने से सम्बन्धित ज्ञान तमोगुणी कहा जाता है।