हि

अध्याय 18 · 22 / 74

18.23

नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम् ।
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ॥ २३ ॥

नियतम्—नियमित; संग-रहितम्—आसक्ति रहित; अराग-द्वेषतः—राग अथवा द्वेष के बिना; कृतम्—किया गया; अफल-प्रेप्सुना—फल की कामना के बिना; कर्म—कर्म; यत्—जो; तत्—वह; सात्त्विकम्—सत्त्वगुण में; उच्यते—कहलाता है।

जहाँ तक कर्मों का सम्बन्ध है, जो कर्तव्य के अनुरूप कर्म आसक्ति रहित होकर, राग अथवा द्वेष के बिना, फल का त्याग करने वाले मनुष्य द्वारा किया जाता है, वह सत्त्वगुणी कर्म कहलाता है।

समाज के विभिन्न आश्रमों तथा विभागों के अनुसार शास्त्रों में विहित नियमित वृत्तिपरक कर्तव्य, जो आसक्ति अथवा स्वामित्व-भाव के बिना और इसी कारण किसी राग अथवा द्वेष के बिना, तथा आत्म-तुष्टि अथवा आत्म-भोग के बिना परमेश्वर की प्रसन्नता हेतु कृष्णभावनामृत में सम्पन्न किए जाते हैं, सत्त्वगुणी कर्म कहलाते हैं।