अध्याय 18 · 23 / 74
18.24
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः ।
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥ २४ ॥
यत्—जो; तु—किन्तु; काम-ईप्सुना—फल की कामना से; कर्म—कर्म; साहंकारेण—अहंकार सहित; वा—अथवा; पुनः—फिर; क्रियते—किया जाता है; बहुल-आयासम्—महान् परिश्रम सहित; तत्—वह; राजसम्—रजोगुण में; उदाहृतम्—कहा जाता है।
किन्तु अपनी इच्छाओं की तृप्ति चाहने वाले मनुष्य द्वारा महान् प्रयत्न से किया गया, तथा मिथ्या अहंकार के भाव से किया गया कर्म रजोगुणी कर्म कहलाता है।