अध्याय 18 · 24 / 74
18.25
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम् ।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥ २५ ॥
अनुबन्धम्—भावी बन्धन; क्षयम्—विनाश; हिंसाम्—हिंसा; अनपेक्ष्य—परिणामों पर विचार किए बिना; च—भी; पौरुषम्—दूसरों को कष्ट देने वाला; मोहात्—मोह के कारण; आरभ्यते—आरम्भ किया जाता है; कर्म—कर्म; यत्—जो; तत्—वह; तामसम्—तमोगुण में; उच्यते—कहा जाता है।
और जो कर्म अज्ञान तथा मोह में, भावी बन्धन अथवा परिणामों पर विचार किए बिना किया जाता है, जो हिंसा करता है और जो अव्यावहारिक है, उसे तमोगुणी कर्म कहा जाता है।
मनुष्य को अपने कर्मों का लेखा-जोखा राज्य के समक्ष अथवा परमेश्वर के यमदूत नामक प्रतिनिधियों के समक्ष देना होता है। उत्तरदायित्व रहित कर्म विक्षेप है, क्योंकि यह शास्त्रीय आदेश के नियामक सिद्धान्तों का विनाश करता है। यह प्रायः हिंसा पर आधारित होता है और अन्य जीवों को कष्ट देने वाला होता है। ऐसा उत्तरदायित्व रहित कर्म अपने व्यक्तिगत अनुभव के आलोक में किया जाता है। यही मोह कहलाता है। और ऐसा समस्त मोहयुक्त कर्म तमोगुण की उपज है।