हि

अध्याय 18 · 25 / 74

18.26

मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ।
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥ २६ ॥

मुक्त-संगः—समस्त भौतिक संग से मुक्त; अनहम्-वादी—मिथ्या अहंकार के बिना; धृति-उत्साह—महान् उत्साह सहित; समन्वितः—उस रूप में युक्त; सिद्धि—सिद्धि; असिद्ध्योः—असिद्धि; निर्विकारः—बिना परिवर्तन के; कर्ता—कर्ता; सात्त्विकः—सत्त्वगुण में; उच्यते—कहा जाता है।

जो कर्ता समस्त भौतिक आसक्तियों तथा मिथ्या अहंकार से मुक्त है, जो उत्साही एवं दृढ़संकल्प है, तथा जो सफलता अथवा असफलता के प्रति उदासीन है, वह सत्त्वगुणी कर्ता है।

कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति सदा प्रकृति के भौतिक गुणों से परे रहता है। अपने को सौंपे गए कर्म के फल की उसे कोई अपेक्षा नहीं होती, क्योंकि वह मिथ्या अहंकार तथा दर्प से ऊपर है। फिर भी, ऐसे कर्म की पूर्ति तक वह सदा उत्साही रहता है। जो कष्ट उसने उठाया, उसकी वह चिन्ता नहीं करता; वह सदा उत्साही रहता है। उसे सफलता अथवा असफलता की परवाह नहीं होती; वह दुःख अथवा सुख दोनों में समान रहता है। ऐसा कर्ता सत्त्वगुण में स्थित होता है।