अध्याय 18 · 26 / 74
18.27
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः ।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥ २७ ॥
रागी—अत्यन्त आसक्त; कर्म-फल—कर्म के फल के प्रति; प्रेप्सुः—इच्छा करने वाला; लुब्धः—लोभी; हिंसा-आत्मकः—तथा सदा ईर्ष्यालु; अशुचिः—अपवित्र; हर्ष-शोक-अन्वितः—हर्ष तथा शोक से ग्रस्त; कर्ता—ऐसा कर्ता; राजसः—रजोगुण में; परिकीर्तितः—घोषित किया जाता है।
किन्तु जो कर्ता अपने श्रम के फलों के प्रति आसक्त है और उनका भोग करने की प्रबल कामना रखता है, जो लोभी, ईर्ष्यालु तथा अपवित्र है और सुख-दुःख से विचलित होता है, वह रजोगुणी कर्ता है।
कोई व्यक्ति किसी विशेष प्रकार के कर्म अथवा उसके फल के प्रति अत्यधिक आसक्त होता है, क्योंकि उसकी भौतिकता अथवा गृह तथा घर, पत्नी एवं सन्तान के प्रति अति आसक्ति होती है। ऐसे व्यक्ति को जीवन के उच्चतर उत्थान की कोई इच्छा नहीं होती। वह केवल इस संसार को यथासम्भव भौतिक दृष्टि से सुखमय बनाने में लगा रहता है। वह सामान्यतः अत्यन्त लोभी होता है, और सोचता है कि उसके द्वारा प्राप्त की गई प्रत्येक वस्तु स्थायी है और कभी नष्ट नहीं होगी। ऐसा व्यक्ति दूसरों से ईर्ष्या करता है और इन्द्रियतृप्ति हेतु कोई भी अनुचित कार्य करने को तत्पर रहता है। अतः ऐसा व्यक्ति अपवित्र होता है, और उसे इसकी परवाह नहीं होती कि उसकी कमाई पवित्र है अथवा अपवित्र। यदि उसका कर्म सफल हो तो वह अत्यन्त प्रसन्न होता है और यदि उसका कर्म सफल न हो तो अत्यन्त दुःखी होता है। ऐसा ही रजोगुणी मनुष्य होता है।