अध्याय 18 · 27 / 74
18.28
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः ।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥ २८ ॥
अयुक्तः—शास्त्रीय आदेशों के सन्दर्भ के बिना; प्राकृतः—भौतिकतावादी; स्तब्धः—हठी; शठः—कपटी; नैष्कृतिकः—दूसरों का अपमान करने में निपुण; अलसः—आलसी; विषादी—खिन्न; दीर्घ-सूत्री—विलम्ब करने वाला; च—भी; कर्ता—कर्ता; तामसः—तमोगुण में; उच्यते—कहा जाता है।
और जो कर्ता सदा शास्त्र के आदेश के विरुद्ध कर्म में संलग्न रहता है, जो भौतिकतावादी, हठी, छली तथा दूसरों का अपमान करने में निपुण है, जो आलसी, सदा खिन्न तथा विलम्ब करने वाला है, वह तमोगुणी कर्ता है।
शास्त्रीय आदेशों में हमें यह मिलता है कि किस प्रकार का कर्म करना चाहिए और किस प्रकार का कर्म नहीं करना चाहिए। जो लोग उन आदेशों की परवाह नहीं करते, वे न करने योग्य कर्म में संलग्न होते हैं, और ऐसे व्यक्ति सामान्यतः भौतिकतावादी होते हैं। वे शास्त्र के आदेशों के अनुसार नहीं, अपितु प्रकृति के गुणों के अनुसार कर्म करते हैं। ऐसे कर्ता अधिक सौम्य नहीं होते, और सामान्यतः सदा धूर्त तथा दूसरों का अपमान करने में निपुण रहते हैं। वे अत्यन्त आलसी होते हैं; यद्यपि उनका कोई कर्तव्य होता है, वे उसे ठीक से नहीं करते, और उसे बाद में करने के लिए टाल देते हैं। इसी कारण वे खिन्न प्रतीत होते हैं। वे विलम्ब करते हैं; जो कार्य एक घण्टे में किया जा सकता है, उसे वे वर्षों तक खींचते रहते हैं। ऐसे कर्ता तमोगुण में स्थित होते हैं।