हि

अध्याय 18 · 28 / 74

18.29

बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु ।
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय ॥ २९ ॥

बुद्धेः—बुद्धि के; भेदम्—भेद; धृतेः—धृति के; च—भी; एव—निश्चय ही; गुणतः—प्रकृति के गुणों के अनुसार; त्रि-विधम्—तीन प्रकार के; शृणु—सुनो; प्रोच्यमानम्—मेरे द्वारा वर्णित; अशेषेण—विस्तार से; पृथक्त्वेन—भिन्न-भिन्न रूप से; धनञ्जय—हे धनञ्जय।

हे धनञ्जय, अब सुनो, मैं तुम्हें प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार तीन प्रकार की बुद्धि तथा धृति का विस्तार से वर्णन करता हूँ।

अब प्रकृति के गुणों के अनुसार ज्ञान, ज्ञेय तथा ज्ञाता को तीन विभिन्न विभागों में समझाने के पश्चात् भगवान् उसी प्रकार कर्ता की बुद्धि तथा धृति का वर्णन कर रहे हैं।