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अध्याय 18 · 29 / 74

18.30

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३० ॥

प्रवृत्तिम्—करने योग्य; च—भी; निवृत्तिम्—न करने योग्य; कार्य—कर्म; अकार्ये—प्रतिक्रिया; भय—भय; अभये—अभय; बन्धम्—बन्धन; मोक्षम् च—तथा मुक्ति; या—जो; वेत्ति—जानती है; बुद्धिः—बुद्धि; सा—वह; पार्थ—हे पृथापुत्र; सात्त्विकी—सत्त्वगुण में।

हे पृथापुत्र, जिस बुद्धि से मनुष्य जानता है कि क्या करना चाहिए तथा क्या नहीं करना चाहिए, किससे डरना चाहिए तथा किससे नहीं डरना चाहिए, क्या बन्धनकारी है तथा क्या मुक्तिदायक है, वह बुद्धि सत्त्वगुण में स्थित है।

शास्त्रों के निर्देशों के अनुसार जो कर्म किए जाते हैं, वे प्रवृत्ति अथवा करने योग्य कर्म कहलाते हैं, और जो कर्म इस प्रकार निर्दिष्ट नहीं हैं, वे न करने योग्य हैं। जो मनुष्य शास्त्रीय निर्देशों को नहीं जानता, वह कर्म की क्रियाओं तथा प्रतिक्रियाओं में उलझ जाता है। जो बुद्धि विवेक द्वारा विभेद करती है, वह सत्त्वगुण में स्थित है।