हि

अध्याय 18 · 4 / 74

18.4

निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः ॥ ४ ॥

निश्चयम्—निश्चय ही; शृणु—सुनो; मे—मुझसे; तत्र—वहाँ; त्यागे—त्याग के विषय में; भरत-सत्तम—हे भरतश्रेष्ठ; त्यागः—त्याग; हि—निश्चय ही; पुरुष-व्याघ्र—हे मनुष्यों में व्याघ्र; त्रि-विधः—तीन प्रकार का; सम्प्रकीर्तितः—घोषित किया गया है।

हे भरतश्रेष्ठ, अब मुझसे त्याग के विषय में सुनो। हे मनुष्यों में व्याघ्र, शास्त्रों में तीन प्रकार के त्याग घोषित किए गए हैं।

यद्यपि त्याग के विषय में मतभेद हैं, यहाँ पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण अपना निर्णय देते हैं, जिसे अन्तिम मानना चाहिए। आख़िर वेद भगवान् द्वारा प्रदत्त विविध विधान ही तो हैं। यहाँ भगवान् स्वयं उपस्थित हैं, और उनके वचन को अन्तिम मानना चाहिए। भगवान् कहते हैं कि त्याग की प्रक्रिया पर उन भौतिक प्रकृति के गुणों के अनुसार विचार किया जाना चाहिए, जिनमें वह सम्पन्न की जाती है।