अध्याय 18 · 30 / 74
18.31
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥ ३१ ॥
यया—जिसके द्वारा; धर्मम्—धर्म; अधर्मम् च—तथा अधर्म; कार्यम्—कर्म; च—भी; अकार्यम्—न करने योग्य; एव—निश्चय ही; च—भी; अयथावत्—अपूर्ण रूप से; प्रजानाति—जानती है; बुद्धिः—बुद्धि; सा—वह; पार्थ—हे पृथापुत्र; राजसी—रजोगुण में।
और जो बुद्धि धार्मिक जीवन-पद्धति तथा अधार्मिक जीवन-पद्धति में, करने योग्य कर्म तथा न करने योग्य कर्म में भेद नहीं कर पाती, हे पृथापुत्र, वह अपूर्ण बुद्धि रजोगुण में है।
रजोगुणी बुद्धि सदा विपरीत रूप से कार्य करती है। वह ऐसे धर्मों को स्वीकार करती है जो वस्तुतः धर्म नहीं हैं, और यथार्थ धर्म को अस्वीकार कर देती है। उसके समस्त विचार तथा क्रियाएँ दिग्भ्रमित होती हैं। रजोगुणी बुद्धि वाले मनुष्य किसी महान् आत्मा को साधारण मनुष्य समझते हैं और किसी साधारण मनुष्य को महान् आत्मा मान लेते हैं। वे सत्य को असत्य समझते हैं और असत्य को सत्य मान लेते हैं। समस्त क्रियाओं में वे केवल कुमार्ग ही ग्रहण करते हैं; इसी कारण उनकी बुद्धि रजोगुण में है।