हि

अध्याय 18 · 31 / 74

18.32

अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता ।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥ ३२ ॥

अधर्मम्—अधर्म; धर्मम्—धर्म; इति—इस प्रकार; या—जो; मन्यते—मानती है; तमसा—मोह से; आवृता—आच्छादित; सर्व-अर्थान्—समस्त वस्तुओं को; विपरीतान्—विपरीत दिशा में; च—भी; बुद्धिः—बुद्धि; सा—वह; पार्थ—हे पृथापुत्र; तामसी—तमोगुण में।

हे पार्थ, जो बुद्धि मोह तथा अन्धकार के वशीभूत होकर अधर्म को धर्म और धर्म को अधर्म मानती है, और सदा विपरीत दिशा में प्रयत्नशील रहती है, वह तमोगुण में है।