हि

अध्याय 18 · 32 / 74

18.33

धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः ।
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३३ ॥

धृत्या—धृति; यया—जिसके द्वारा; धारयते—धारण की जाती है; मनः—मन; प्राण—प्राण; इन्द्रिय—इन्द्रियों की; क्रियाः—क्रियाएँ; योगेन—योगाभ्यास द्वारा; अव्यभिचारिण्या—बिना किसी विच्छेद के; धृतिः—ऐसी धृति; सा—वह; पार्थ—हे पृथापुत्र; सात्त्विकी—सत्त्वगुण में।

हे पृथापुत्र, जो अटूट धृति योगाभ्यास द्वारा दृढ़ता से धारण की जाती है, और इस प्रकार मन, प्राण तथा इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखती है, वह सत्त्वगुण में है।

योग परमात्मा को समझने का साधन है। जो दृढ़तापूर्वक परमात्मा में स्थिर रहता है, अपने मन, प्राण तथा इन्द्रिय-क्रियाओं को परमेश्वर पर केन्द्रित करता है, वह कृष्णभावनामृत में संलग्न होता है। ऐसी धृति सत्त्वगुण में है। अव्यभिचारिण्या शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह उन व्यक्तियों की ओर संकेत करता है जो कृष्णभावनामृत में संलग्न रहते हैं और किसी अन्य क्रिया से कभी विचलित नहीं होते।