हि

अध्याय 18 · 33 / 74

18.34

यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन ।
प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥ ३४ ॥

यया—जिसके द्वारा; तु—किन्तु; धर्म-काम-अर्थान्—धर्म तथा आर्थिक विकास हेतु; धृत्या—धृति द्वारा; धारयते—उन रूपों में; अर्जुन—हे अर्जुन; प्रसंगेन—उसके लिए; फल-आकाङ्क्षी—फल की कामना करने वाला; धृतिः—धृति; सा—वह; पार्थ—हे पृथापुत्र; राजसी—रजोगुण में।

और हे अर्जुन, जिस धृति से मनुष्य धर्म, आर्थिक विकास तथा इन्द्रियतृप्ति के फल को दृढ़ता से थामे रहता है, वह रजोगुणी स्वभाव की है।

जो व्यक्ति धार्मिक अथवा आर्थिक क्रियाओं में सदा फल की कामना करता है, जिसकी एकमात्र इच्छा इन्द्रियतृप्ति है, और जिसका मन, प्राण तथा इन्द्रियाँ इसी प्रकार संलग्न रहती हैं, वह रजोगुण में है।