अध्याय 18 · 34 / 74
18.35
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च ।
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥ ३५ ॥
yayā—जिससे; svapnam—स्वप्न; bhayam—भय; śokam—शोक; viṣādam—विषाद; madam—मोह; eva—निश्चय ही; ca—भी; na—कभी नहीं; vimuñcati—मुक्त होती है; durmedhāḥ—अल्पबुद्धि; dhṛtiḥ—धृति; sā—वह; pārtha—हे पृथापुत्र; tāmasī—तमोगुण में।
और जो धृति स्वप्न, भय, शोक, विषाद तथा मोह से परे नहीं जा पाती—वह अल्पबुद्धियुक्त धृति तमोगुण में है।
यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि सत्त्वगुण में स्थित व्यक्ति स्वप्न नहीं देखता। यहाँ स्वप्न का अर्थ अत्यधिक निद्रा है। स्वप्न तो सदा रहता है; सत्त्व, रज अथवा तमोगुण—किसी में भी स्वप्न एक स्वाभाविक घटना है। किन्तु जो अति-निद्रा से बच नहीं सकते, जो भौतिक वस्तुओं के भोग के गर्व से बच नहीं सकते, और जो सदा भौतिक जगत् पर स्वामित्व का स्वप्न देखते रहते हैं, जिनका जीवन, मन तथा इन्द्रियाँ इसी में संलग्न रहती हैं, वे तमोगुण में स्थित माने जाते हैं।