अध्याय 18 · 35 / 74
18.36-37
सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ॥ ३६ ॥
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् ।
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥ ३७ ॥
sukham—सुख; tu—किन्तु; idānīm—अब; tri-vidham—तीन प्रकार का; śṛṇu—सुनो; me—मुझसे; bharatarṣabha—हे भरतश्रेष्ठ; abhyāsāt—अभ्यास से; ramate—भोग करता है; yatra—जहाँ; duḥkha—दुःख; antam—अन्त; ca—भी; nigacchati—प्राप्त करता है; yat—जो; tat—वह; agre—आरम्भ में; viṣam iva—विष के समान; pariṇāme—अन्त में; amṛta—अमृत; upamam—तुल्य; tat—वह; sukham—सुख; sāttvikam—सत्त्वगुण में; proktam—कहा गया है; ātma—आत्मा; buddhi—बुद्धि; prasāda-jam—सन्तोषजनक।
हे भरतश्रेष्ठ, अब तुम मुझसे उन तीन प्रकार के सुखों के विषय में सुनो जिनका भोग बद्धजीव करता है, और जिनके द्वारा वह कभी-कभी समस्त दुःखों के अन्त को प्राप्त होता है। जो आरम्भ में विष के समान प्रतीत होता है, किन्तु अन्त में अमृत के समान होता है, और जो मनुष्य को आत्म-साक्षात्कार के प्रति जागृत करता है, वह सत्त्वगुण में स्थित सुख कहलाता है।
बद्धजीव बारम्बार भौतिक सुख का भोग करने का प्रयत्न करता है। इस प्रकार वह चबाए हुए को ही चबाता रहता है, किन्तु कभी-कभी ऐसे भोग के क्रम में वह किसी महान् आत्मा के संग से भौतिक बन्धन से मुक्त हो जाता है। दूसरे शब्दों में, बद्धजीव सदा किसी-न-किसी प्रकार की इन्द्रियतृप्ति में संलग्न रहता है, किन्तु जब वह सत्संग के द्वारा यह समझ जाता है कि यह तो उसी वस्तु की मात्र पुनरावृत्ति है, और वह अपनी वास्तविक कृष्णभावनामृत के प्रति जागृत हो उठता है, तब वह कभी-कभी इस पुनरावृत्तिमूलक तथाकथित सुख से मुक्त हो जाता है।
आत्म-साक्षात्कार की खोज में मनुष्य को मन तथा इन्द्रियों को वश में करने और मन को आत्मा पर एकाग्र करने हेतु अनेक नियमों एवं विधियों का पालन करना पड़ता है। ये समस्त विधियाँ अत्यन्त कठिन हैं, विष के समान कटु हैं, किन्तु यदि कोई इन नियमों के पालन में सफल हो जाता है और दिव्य स्थिति को प्राप्त करता है, तो वह वास्तविक अमृत का पान आरम्भ कर देता है, और जीवन का आनन्द लेता है।