हि

अध्याय 18 · 36 / 74

18.38

विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् ।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥ ३८ ॥

viṣaya—इन्द्रिय-विषय; indriya—इन्द्रियाँ; saṁyogāt—संयोग से; yat—जो; tat—वह; agre—आरम्भ में; amṛta-upamam—अमृत के तुल्य; pariṇāme—अन्त में; viṣam iva—विष के समान; tat—वह; sukham—सुख; rājasam—रजोगुण में; smṛtam—माना जाता है।

जो सुख इन्द्रियों के अपने विषयों से सम्पर्क से उत्पन्न होता है, और जो आरम्भ में अमृत के समान किन्तु अन्त में विष के समान प्रतीत होता है, वह रजोगुण के स्वभाव वाला कहा जाता है।

एक युवक तथा एक युवती मिलते हैं, और इन्द्रियाँ उस युवक को प्रेरित करती हैं कि वह उसे देखे, उसका स्पर्श करे तथा उसके साथ संभोग करे। आरम्भ में यह इन्द्रियों को अत्यन्त सुखद प्रतीत हो सकता है, किन्तु अन्त में, अथवा कुछ काल पश्चात्, यह विष के समान बन जाता है। वे पृथक् हो जाते हैं अथवा विवाह-विच्छेद हो जाता है, शोक होता है, दुःख होता है, इत्यादि। ऐसा सुख सदा रजोगुण में होता है। इन्द्रियों तथा इन्द्रिय-विषयों के संयोग से उत्पन्न सुख सदा दुःख का कारण होता है, और इससे हर प्रकार से बचना चाहिए।