अध्याय 18 · 37 / 74
18.39
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः ।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ ३९ ॥
yat—जो; agre—आरम्भ में; ca—भी; anubandhe—बन्धन से; ca—भी; sukham—सुख; mohanam—मोह; ātmanaḥ—आत्मा का; nidrā—निद्रा; ālasya—आलस्य; pramāda—प्रमाद; uttham—से उत्पन्न; tat—वह; tāmasam—तमोगुण में; udāhṛtam—कहा जाता है।
और जो सुख आत्म-साक्षात्कार के प्रति अन्धा है, जो आदि से अन्त तक भ्रम है, और जो निद्रा, आलस्य तथा प्रमाद से उत्पन्न होता है, वह तमोगुण के स्वभाव वाला कहा जाता है।
जो आलस्य तथा निद्रा में आनन्द लेता है, वह निश्चय ही तमोगुण में है, और जिसे यह ज्ञान नहीं कि कैसे कर्म करना चाहिए और कैसे नहीं, वह भी तमोगुण में है। तमोगुण में स्थित व्यक्ति के लिए सब कुछ भ्रम है। न आरम्भ में सुख है, न अन्त में। रजोगुण में स्थित व्यक्ति के लिए आरम्भ में कुछ क्षणिक सुख और अन्त में दुःख हो सकता है, किन्तु तमोगुण में स्थित व्यक्ति के लिए आदि तथा अन्त दोनों में केवल दुःख ही है।