अध्याय 18 · 5 / 74
18.5
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥ ५ ॥
यज्ञ—यज्ञ; दान—दान; तपः—तप; कर्म—कर्म; न—कभी नहीं; त्याज्यम्—त्यागने योग्य; कार्यम्—करना ही चाहिए; एव—निश्चय ही; तत्—वह; यज्ञः—यज्ञ; दानम्—दान; तपः—तप; च—भी; एव—निश्चय ही; पावनानि—पवित्र करने वाले; मनीषिणाम्—महान् आत्माओं को भी।
यज्ञ, दान तथा तप के कर्म त्यागे नहीं जाने चाहिए, अपितु सम्पन्न किए जाने चाहिए। निस्सन्देह यज्ञ, दान तथा तप महान् आत्माओं को भी पवित्र कर देते हैं।
योगियों को मानव-समाज की उन्नति हेतु कर्म करने चाहिए। मनुष्य को आध्यात्मिक जीवन की ओर उन्नत करने हेतु अनेक शुद्धिकरण-प्रक्रियाएँ हैं। उदाहरणार्थ, विवाह-संस्कार को इन्हीं यज्ञों में से एक माना जाता है। इसे विवाह-यज्ञ कहते हैं। क्या किसी संन्यासी को, जो संन्यास-आश्रम में स्थित है और जिसने अपने पारिवारिक सम्बन्धों का त्याग कर दिया है, विवाह-संस्कार को प्रोत्साहित करना चाहिए? भगवान् यहाँ कहते हैं कि जो भी यज्ञ मानव-कल्याण हेतु है, उसका कभी त्याग नहीं किया जाना चाहिए। विवाह-यज्ञ, अर्थात् विवाह-संस्कार, का प्रयोजन मानव-मन को नियमित करके उसे आध्यात्मिक उन्नति हेतु शान्त बनाना है। अधिकांश मनुष्यों के लिए इस विवाह-यज्ञ को संन्यास-आश्रम में स्थित व्यक्तियों द्वारा भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। संन्यासियों को स्त्रियों के साथ कभी संग नहीं करना चाहिए, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि जो जीवन के निम्नतर सोपानों में है, अर्थात् कोई युवक, उसे विवाह-संस्कार में पत्नी स्वीकार नहीं करनी चाहिए। समस्त विहित यज्ञों का प्रयोजन परमेश्वर की प्राप्ति है। अतः निम्नतर सोपानों में उनका त्याग नहीं किया जाना चाहिए। इसी प्रकार दान हृदय की शुद्धि के लिए है। यदि दान उपयुक्त व्यक्तियों को दिया जाए, जैसा कि पूर्व में वर्णित किया गया, तो वह मनुष्य को उन्नत आध्यात्मिक जीवन की ओर ले जाता है।