अध्याय 18 · 43 / 74
18.45
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नर
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ॥ ४५ ॥
sve—अपने; sve—अपने; karmaṇi—कर्म में; abhirataḥ—संलग्न; saṁsiddhim—सिद्धि; labhate—प्राप्त करता है; naraḥ—मनुष्य; sva-karma—अपने कर्तव्य से; nirataḥ—संलग्न; siddhim—सिद्धि; yathā—जैसे; vindati—प्राप्त करता है; tat—वह; śṛṇu—सुनो।
अपने कर्म के गुणों का अनुसरण करके प्रत्येक मनुष्य सिद्ध बन सकता है। अब तुम मुझसे यह सुनो कि यह कैसे किया जा सकता है।