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अध्याय 18 · 45 / 74

18.47

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥ ४७ ॥

śreyān—श्रेष्ठतर; sva-dharmaḥ—अपना व्यवसाय; viguṇaḥ—अपूर्ण रूप से सम्पन्न; para-dharmāt—दूसरे के व्यवसाय की अपेक्षा; su-anuṣṭhitāt—भली-भाँति सम्पन्न; svabhāva-niyatam—अपने स्वभाव के अनुसार विहित कर्तव्य; karma—कर्म; kurvan—करता हुआ; na—कभी नहीं; āpnoti—प्राप्त करता है; kilbiṣam—पापमय प्रतिक्रियाएँ।

अपने व्यवसाय में संलग्न रहना श्रेष्ठतर है, भले ही मनुष्य उसे अपूर्ण रूप से सम्पन्न करे, अपेक्षाकृत इसके कि वह दूसरे के व्यवसाय को स्वीकार करे और उसे पूर्ण रूप से सम्पन्न करे। अपने स्वभाव के अनुसार विहित कर्तव्य कभी पापमय प्रतिक्रियाओं से प्रभावित नहीं होते।

मनुष्य के व्यावसायिक कर्तव्य का विधान भगवद्गीता में किया गया है। जैसा कि पूर्व श्लोकों में पहले ही विवेचन हो चुका है, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र के कर्तव्य प्रकृति के विशिष्ट गुणों के अनुसार विहित हैं। मनुष्य को दूसरे के कर्तव्य का अनुकरण नहीं करना चाहिए। जो मनुष्य स्वभाव से शूद्रों द्वारा किए जाने वाले प्रकार के कर्म की ओर आकृष्ट है, उसे कृत्रिम रूप से स्वयं को ब्राह्मण घोषित नहीं करना चाहिए, भले ही उसका जन्म किसी ब्राह्मण-परिवार में हुआ हो। इस प्रकार मनुष्य को अपने स्वभाव के अनुसार कर्म करना चाहिए; यदि परमेश्वर की सेवा में सम्पन्न किया जाए तो कोई भी कर्म निन्द्य नहीं है। ब्राह्मण का व्यावसायिक कर्तव्य निश्चय ही सत्त्वगुण में है, किन्तु यदि कोई व्यक्ति स्वभाव से सत्त्वगुण में नहीं है, तो उसे ब्राह्मण के व्यावसायिक कर्तव्य का अनुकरण नहीं करना चाहिए। क्षत्रिय अथवा शासक के लिए अनेक निन्द्य बातें हैं; क्षत्रिय को अपने शत्रुओं का वध करने हेतु हिंसक होना पड़ता है, और कभी-कभी क्षत्रिय को कूटनीति के निमित्त असत्य भी बोलना पड़ता है। ऐसी हिंसा तथा कपट राजनीतिक मामलों के साथ चलते हैं, किन्तु क्षत्रिय से यह अपेक्षित नहीं कि वह अपने व्यावसायिक कर्तव्य का त्याग कर दे और ब्राह्मण के कर्तव्यों को सम्पन्न करने का प्रयत्न करे।

मनुष्य को परमेश्वर की प्रसन्नता हेतु कर्म करना चाहिए। उदाहरणार्थ, अर्जुन एक क्षत्रिय था। वह दूसरे पक्ष से युद्ध करने में हिचक रहा था। किन्तु यदि ऐसा युद्ध पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण के निमित्त सम्पन्न किया जाए, तो पतन का कोई भय नहीं रहता। वाणिज्य के क्षेत्र में भी, कभी-कभी व्यापारी को लाभ कमाने हेतु अनेक असत्य बोलने पड़ते हैं। यदि वह ऐसा न करे, तो कोई लाभ नहीं हो सकता। कभी-कभी व्यापारी कहता है, “हे मेरे प्रिय ग्राहक, तुम्हारे लिए मैं कोई लाभ नहीं ले रहा,” किन्तु यह जान लेना चाहिए कि लाभ के बिना व्यापारी का अस्तित्व ही नहीं रह सकता। अतएव यदि कोई व्यापारी कहे कि वह लाभ नहीं ले रहा, तो इसे एक सरल असत्य मान लेना चाहिए। किन्तु व्यापारी को यह नहीं सोचना चाहिए कि चूँकि वह ऐसे व्यवसाय में संलग्न है जिसमें असत्य बोलना अनिवार्य है, अतः उसे अपना व्यवसाय त्यागकर ब्राह्मण का व्यवसाय अपनाना चाहिए। इसकी अनुशंसा नहीं की जाती। कोई क्षत्रिय हो, वैश्य हो अथवा शूद्र, इससे अन्तर नहीं पड़ता, यदि वह अपने कर्म से पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की सेवा करता है। ब्राह्मणगण तक, जो विविध प्रकार के यज्ञ सम्पन्न करते हैं, कभी-कभी पशुओं का वध करते हैं, क्योंकि ऐसे अनुष्ठानों में कभी-कभी पशुओं का बलिदान किया जाता है। इसी प्रकार, यदि अपने व्यवसाय में संलग्न क्षत्रिय किसी शत्रु का वध कर देता है, तो उसे कोई पाप नहीं लगता। तीसरे अध्याय में इन विषयों की स्पष्ट तथा विस्तृत व्याख्या की गई है; प्रत्येक मनुष्य को यज्ञ के निमित्त, अथवा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु के निमित्त कर्म करना चाहिए। व्यक्तिगत इन्द्रियतृप्ति के लिए किया गया कोई भी कर्म बन्धन का कारण है। निष्कर्ष यह है कि प्रत्येक को उस विशिष्ट प्रकृति-गुण के अनुसार संलग्न होना चाहिए जिसे उसने अर्जित किया है, और उसे केवल परमेश्वर के परम प्रयोजन की सेवा हेतु ही कर्म करने का निश्चय करना चाहिए।