अध्याय 18 · 6 / 74
18.6
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥ ६ ॥
एतानि—ये सब; अपि—निश्चय ही; तु—अवश्य; कर्माणि—कर्म; सङ्गम्—संग; त्यक्त्वा—त्यागकर; फलानि—फल; च—भी; कर्तव्यानि—कर्तव्य के रूप में; इति—इस प्रकार; मे—मेरा; पार्थ—हे पृथापुत्र; निश्चितम्—निश्चित; मतम्—मत; उत्तमम्—श्रेष्ठ।
ये समस्त कर्म फल की किसी भी अपेक्षा के बिना सम्पन्न किए जाने चाहिए। हे पृथापुत्र, इन्हें कर्तव्य के रूप में सम्पन्न किया जाना चाहिए। यही मेरा अन्तिम मत है।
यद्यपि समस्त यज्ञ पवित्र करने वाले हैं, तथापि मनुष्य को ऐसे अनुष्ठानों से किसी फल की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। दूसरे शब्दों में, जो यज्ञ जीवन में भौतिक उन्नति हेतु हैं, उनका त्याग कर देना चाहिए, किन्तु जो यज्ञ मनुष्य के अस्तित्व को शुद्ध करते हैं और उसे आध्यात्मिक स्तर तक उठाते हैं, उन्हें बन्द नहीं किया जाना चाहिए। जो कुछ भी कृष्णभावनामृत की ओर ले जाता है, उसे प्रोत्साहित करना चाहिए। श्रीमद्भागवत में भी कहा गया है कि जो भी कर्म भगवान् की भक्ति की ओर ले जाए, उसे स्वीकार किया जाना चाहिए। यही धर्म की सर्वोच्च कसौटी है। भगवान् के भक्त को किसी भी प्रकार का वह कर्म, यज्ञ अथवा दान स्वीकार करना चाहिए जो भगवान् की भक्ति के सम्पादन में उसकी सहायता करे।