हि

अध्याय 18 · 51 / 74

18.55

भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः ।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥ ५५ ॥

भक्त्या—शुद्ध भक्ति से; माम्—मुझे; अभिजानाति—मनुष्य जान सकता है; यावान्—जितना; यः च अस्मि—जैसा मैं हूँ; तत्त्वतः—यथार्थ रूप में; ततः—तदुपरान्त; माम्—मुझे; तत्त्वतः—सत्यतः; ज्ञात्वा—जानकर; विशते—प्रवेश करता है; तत्—तत्पश्चात्; अनन्तरम्—बाद में

पूर्ण पुरुषोत्तम को उनके यथार्थ रूप में केवल भक्ति के द्वारा ही समझा जा सकता है। और जब मनुष्य ऐसी भक्ति के द्वारा परमेश्वर के प्रति पूर्ण भावना से युक्त हो जाता है, तब वह भगवान् के राज्य में प्रवेश कर सकता है।

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण तथा उनके पूर्ण अंशों को न तो मानसिक कल्पना से और न ही अभक्तों के द्वारा समझा जा सकता है। यदि कोई पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को समझना चाहता है, तो उसे किसी शुद्ध भक्त के मार्गदर्शन में शुद्ध भक्ति का आश्रय लेना होगा। अन्यथा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का सत्य सदा गुप्त ही रहेगा। यह पहले ही कहा जा चुका है (नाहं प्रकाशः) कि वे सबके समक्ष प्रकट नहीं होते। केवल पाण्डित्यपूर्ण विद्वत्ता अथवा मानसिक कल्पना से प्रत्येक व्यक्ति भगवान् को नहीं समझ सकता। केवल वही, जो वास्तव में कृष्णभावनामृत तथा भक्ति में संलग्न है, यह समझ सकता है कि श्रीकृष्ण क्या हैं। विश्वविद्यालय की उपाधियाँ इसमें सहायक नहीं होतीं।

जो कृष्ण-विज्ञान में पूर्णतया पारंगत हो जाता है, वह आध्यात्मिक राज्य अर्थात् श्रीकृष्ण के धाम में प्रवेश करने का अधिकारी बन जाता है। ब्रह्म बनने का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य अपनी पहचान खो देता है। वहाँ भक्ति विद्यमान रहती है, और जब तक भक्ति विद्यमान है, तब तक भगवान्, भक्त तथा भक्ति की प्रक्रिया—तीनों का होना अनिवार्य है। ऐसा ज्ञान मुक्ति के पश्चात् भी कभी नष्ट नहीं होता। मुक्ति का अर्थ है भौतिक जीवन की धारणा से मुक्त हो जाना; आध्यात्मिक जीवन में वही विभेद रहता है, वही व्यक्तित्व रहता है, किन्तु शुद्ध कृष्णभावनामृत में। मनुष्य को यह भ्रम नहीं करना चाहिए कि “विशते” शब्द, अर्थात् “मुझमें प्रवेश करता है”, उस अद्वैतवादी मत का समर्थन करता है जिसके अनुसार मनुष्य निराकार ब्रह्म के साथ एकरूप हो जाता है। ऐसा नहीं है। विशते का अर्थ है कि मनुष्य अपने व्यक्तित्व सहित परमेश्वर के धाम में प्रवेश कर सकता है, जिससे वह उनकी संगति में रहकर उनकी सेवा कर सके। उदाहरणार्थ, एक हरा पक्षी किसी हरे वृक्ष में वृक्ष के साथ एक होने के लिए नहीं, अपितु उस वृक्ष के फलों का आनन्द लेने के लिए प्रवेश करता है। निर्विशेषवादी प्रायः नदी का उदाहरण देते हैं, जो समुद्र में प्रवाहित होकर उसमें विलीन हो जाती है। यह निर्विशेषवादी के लिए सुख का स्रोत हो सकता है, किन्तु साकारवादी समुद्र में रहने वाले किसी जलचर की भाँति अपना व्यक्तिगत व्यक्तित्व बनाए रखता है। यदि हम गहराई में जाएँ, तो समुद्र के भीतर हमें अनेकानेक जीव मिलते हैं। समुद्र से ऊपरी परिचय पर्याप्त नहीं है; समुद्र की गहराइयों में रहने वाले जलचरों का पूर्ण ज्ञान होना चाहिए।

अपनी शुद्ध भक्ति के कारण भक्त परमेश्वर के दिव्य गुणों तथा ऐश्वर्यों को यथार्थ रूप में समझ सकता है। जैसा कि ग्यारहवें अध्याय में कहा गया है, केवल भक्ति के द्वारा ही मनुष्य समझ सकता है। यहाँ भी इसी की पुष्टि होती है; मनुष्य भक्ति के द्वारा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को समझ सकता है और उनके राज्य में प्रवेश कर सकता है।

भौतिक धारणाओं से मुक्ति की ब्रह्मभूत अवस्था को प्राप्त करने के पश्चात् भक्ति का आरम्भ भगवान् के विषय में श्रवण से होता है। जब मनुष्य परमेश्वर के विषय में श्रवण करता है, तब स्वतः ही ब्रह्मभूत अवस्था विकसित होती है, और भौतिक कल्मष—विषय-भोग के प्रति लोभ तथा काम—विलुप्त हो जाता है। ज्यों-ज्यों भक्त के हृदय से काम तथा वासनाएँ विलीन होती हैं, त्यों-त्यों वह भगवान् की सेवा के प्रति अधिकाधिक आसक्त होता जाता है, और इसी आसक्ति के द्वारा वह भौतिक कल्मष से मुक्त हो जाता है। जीवन की उसी अवस्था में वह परमेश्वर को समझ सकता है। यह श्रीमद्भागवत का भी कथन है। मुक्ति के पश्चात् भी भक्ति अथवा दिव्य सेवा की प्रक्रिया चलती रहती है। वेदान्त-सूत्र इसकी पुष्टि करता है: आप्रायणात् तत्रापि हि दृष्टम्। इसका अर्थ है कि मुक्ति के पश्चात् भी भक्ति की प्रक्रिया चलती रहती है। श्रीमद्भागवत में वास्तविक भक्तिमयी मुक्ति की परिभाषा जीव की अपनी पहचान, अपनी स्वरूपगत स्थिति में पुनःस्थापना के रूप में की गई है। स्वरूपगत स्थिति की व्याख्या पहले ही की जा चुकी है: प्रत्येक जीव परमेश्वर का अभिन्न अंशभूत खण्ड है। अतः उसकी स्वरूपगत स्थिति सेवा करना है। मुक्ति के पश्चात् यह सेवा कभी नहीं रुकती। वास्तविक मुक्ति का अर्थ है जीवन की मिथ्या धारणाओं से मुक्त हो जाना।