हि

अध्याय 18 · 52 / 74

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सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः ।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥ ५६ ॥

सर्व—समस्त; कर्माणि—कर्म; अपि—यद्यपि; सदा—सदैव; कुर्वाणः—करते हुए; मत्—मेरी; व्यपाश्रयः—शरण में; मत्—मेरी; प्रसादात्—कृपा से; अवाप्नोति—प्राप्त करता है; शाश्वतम्—नित्य; पदम्—धाम; अव्ययम्—अविनाशी।

यद्यपि मेरा भक्त सब प्रकार के कर्मों में संलग्न रहता है, फिर भी मेरी शरण में रहकर वह मेरी कृपा से नित्य तथा अविनाशी धाम को प्राप्त करता है।

मद्-व्यपाश्रयः शब्द का अर्थ है परमेश्वर की शरण में। भौतिक कल्मष से मुक्त होने के लिए शुद्ध भक्त परमेश्वर अथवा उनके प्रतिनिधि, आध्यात्मिक गुरु, के निर्देशन में कर्म करता है। शुद्ध भक्त के लिए कोई समय-सीमा नहीं होती। वह सदा, चौबीसों घण्टे, शत-प्रतिशत परमेश्वर के निर्देशन में कर्मों में संलग्न रहता है। जो भक्त इस प्रकार कृष्णभावनामृत में संलग्न रहता है, उस पर भगवान् अत्यन्त, अत्यन्त कृपालु रहते हैं। समस्त कठिनाइयों के होते हुए भी, वह अन्ततः दिव्य धाम अर्थात् कृष्णलोक में स्थापित हो जाता है। वहाँ उसका प्रवेश सुनिश्चित है; इसमें कोई सन्देह नहीं। उस परम धाम में कोई परिवर्तन नहीं होता; वहाँ सब कुछ नित्य, अविनाशी तथा ज्ञान से परिपूर्ण है।