हि

अध्याय 18 · 53 / 74

18.57

चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्परः ।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥ ५७ ॥

चेतसा—बुद्धि से; सर्व-कर्माणि—सब प्रकार के कर्म; मयि—मुझमें; सन्न्यस्य—त्याग कर; मत्-परः—मेरी शरण में; बुद्धि-योगम्—भक्तिमय कर्म; उपाश्रित्य—आश्रय लेकर; मत्-चित्तः—भावना में; सततम्—चौबीसों घण्टे; भव—हो जाओ।

समस्त कर्मों में केवल मुझ पर आश्रित रहो और सदा मेरी शरण में कर्म करो। ऐसी भक्ति में मेरे प्रति पूर्णतया सचेत रहो।

जब मनुष्य कृष्णभावनामृत में कर्म करता है, तब वह संसार के स्वामी के रूप में कर्म नहीं करता। एक सेवक की भाँति मनुष्य को पूर्णतया परमेश्वर के निर्देशन में कर्म करना चाहिए। सेवक की कोई व्यक्तिगत स्वतन्त्रता नहीं होती। वह केवल स्वामी के आदेश पर कर्म करता है। परम स्वामी की ओर से कर्म करने वाला सेवक लाभ-हानि से कोई मोह नहीं रखता। वह तो केवल भगवान् के आदेश के अनुरूप अपना कर्तव्य निष्ठापूर्वक निभाता है। अब कोई यह तर्क कर सकता है कि अर्जुन तो श्रीकृष्ण के साक्षात् निर्देशन में कर्म कर रहा था, किन्तु जब श्रीकृष्ण उपस्थित न हों, तब मनुष्य को किस प्रकार कर्म करना चाहिए? यदि मनुष्य इस ग्रन्थ में दिए गए श्रीकृष्ण के निर्देश के अनुसार तथा श्रीकृष्ण के प्रतिनिधि के मार्गदर्शन में कर्म करे, तो परिणाम वही होगा। इस श्लोक में संस्कृत शब्द मत्-परः अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यह इंगित करता है कि मनुष्य के जीवन में, केवल श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने हेतु कृष्णभावनामृत में कर्म करने के अतिरिक्त, और कोई लक्ष्य नहीं होता। और इस प्रकार कर्म करते समय मनुष्य को केवल श्रीकृष्ण का ही चिन्तन करना चाहिए: “मुझे यह विशेष कर्तव्य निभाने के लिए श्रीकृष्ण ने नियुक्त किया है।” इस प्रकार कर्म करते हुए मनुष्य को स्वभावतः श्रीकृष्ण का ही चिन्तन करना पड़ता है। यही पूर्ण कृष्णभावनामृत है। किन्तु मनुष्य को यह ध्यान रखना चाहिए कि स्वेच्छाचारितापूर्वक कुछ करने के पश्चात् उसे उसका फल परमेश्वर को अर्पित नहीं करना चाहिए। ऐसा कर्तव्य कृष्णभावनामृत की भक्ति में नहीं आता। मनुष्य को श्रीकृष्ण के आदेश के अनुसार कर्म करना चाहिए। यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बिन्दु है। श्रीकृष्ण का वह आदेश प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु से गुरु-परम्परा के माध्यम से आता है। अतः आध्यात्मिक गुरु के आदेश को जीवन का प्रमुख कर्तव्य मानना चाहिए। यदि मनुष्य को प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु प्राप्त हो जाए और वह उनके निर्देशन के अनुसार कर्म करे, तो कृष्णभावनामृत में उसके जीवन की सिद्धि सुनिश्चित है।