अध्याय 18 · 54 / 74
18.58
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि ॥ ५८ ॥
मत्—मेरी; चित्तः—भावना में; सर्व—समस्त; दुर्गाणि—बाधाएँ; मत्—मेरी; प्रसादात्—कृपा से; तरिष्यसि—तुम पार कर जाओगे; अथ—इसलिए; चेत्—यदि; त्वम्—तुम; अहङ्कारात्—मिथ्या अहंकार से; न—नहीं; श्रोष्यसि—श्रवण नहीं करते; विनङ्क्ष्यसि—तब तुम विनष्ट हो जाओगे।
यदि तुम मेरे प्रति सचेत हो जाओ, तो मेरी कृपा से तुम बद्ध जीवन की समस्त बाधाओं को पार कर जाओगे। किन्तु यदि तुम ऐसी भावना में कर्म न करके मिथ्या अहंकार के द्वारा कर्म करो और मेरा श्रवण न करो, तो तुम विनष्ट हो जाओगे।
पूर्ण कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति अपने अस्तित्व के कर्तव्यों के निर्वाह को लेकर अनुचित रूप से चिन्तित नहीं रहता। मूर्ख जन समस्त चिन्ता से इस महान् मुक्ति को नहीं समझ सकते। जो कृष्णभावनामृत में कर्म करता है, उसके लिए भगवान् श्रीकृष्ण सर्वाधिक घनिष्ठ मित्र बन जाते हैं। वे सदा अपने मित्र की सुख-सुविधा का ध्यान रखते हैं, और उस मित्र को अपने आप को अर्पित कर देते हैं, जो भगवान् को प्रसन्न करने हेतु चौबीसों घण्टे इतनी भक्तिपूर्वक कर्म में संलग्न रहता है। अतः किसी को भी जीवन की देहात्म-बुद्धि के मिथ्या अहंकार में नहीं बह जाना चाहिए। मनुष्य को स्वयं को भौतिक प्रकृति के नियमों से स्वतन्त्र अथवा कर्म करने हेतु मुक्त नहीं मानना चाहिए। वह तो पहले से ही कठोर भौतिक नियमों के अधीन है। किन्तु ज्यों ही वह कृष्णभावनामृत में कर्म करता है, त्यों ही वह मुक्त हो जाता है, भौतिक उलझनों से रहित हो जाता है। मनुष्य को अत्यन्त सावधानीपूर्वक यह ध्यान रखना चाहिए कि जो कृष्णभावनामृत में सक्रिय नहीं है, वह भौतिक भँवर में, जन्म-मृत्यु के सागर में स्वयं को खोता जा रहा है। कोई भी बद्धजीव वास्तव में यह नहीं जानता कि क्या करना है और क्या नहीं करना, किन्तु जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत में कर्म करता है, वह कर्म करने हेतु स्वतन्त्र है, क्योंकि सब कुछ अन्तःकरण से श्रीकृष्ण द्वारा प्रेरित होता है तथा आध्यात्मिक गुरु द्वारा पुष्ट होता है।