अध्याय 18 · 55 / 74
18.59
यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥ ५९ ॥
यत्—इसलिए; अहङ्कारम्—मिथ्या अहंकार; आश्रित्य—शरण लेकर; न—नहीं; योत्स्य—युद्ध करूँगा; इति—इस प्रकार; मन्यसे—सोचते हो; मिथ्या एषः—यह सब मिथ्या है; व्यवसायः ते—तुम्हारा संकल्प; प्रकृतिः—भौतिक प्रकृति; त्वाम्—तुम्हें; नियोक्ष्यति—प्रवृत्त करेगी।
यदि तुम मेरे निर्देश के अनुसार कर्म न करो और युद्ध न करो, तो तुम मिथ्या मार्ग पर चले जाओगे। अपने स्वभाव के कारण तुम्हें युद्ध में प्रवृत्त होना ही पड़ेगा।
अर्जुन एक सैनिक था, और क्षत्रिय स्वभाव में जन्मा था। अतः उसका स्वाभाविक कर्तव्य युद्ध करना था। किन्तु मिथ्या अहंकार के कारण वह भयभीत था कि अपने गुरु, पितामह तथा मित्रों का वध करने से पापपूर्ण प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न होंगी। वस्तुतः वह स्वयं को अपने कर्मों का स्वामी मान रहा था, मानो ऐसे कर्म के शुभ तथा अशुभ फलों का निर्देशन वही कर रहा हो। वह यह भूल गया कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् वहाँ उपस्थित होकर उसे युद्ध करने का उपदेश दे रहे थे। यही बद्धजीव की विस्मृति है। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् यह निर्देश देते हैं कि क्या शुभ है और क्या अशुभ, और मनुष्य को जीवन की सिद्धि प्राप्त करने हेतु केवल कृष्णभावनामृत में कर्म करना होता है। जिस प्रकार परमेश्वर मनुष्य की नियति का निश्चय कर सकते हैं, उस प्रकार कोई अन्य नहीं कर सकता; अतः सर्वोत्तम मार्ग यही है कि मनुष्य परमेश्वर से निर्देश लेकर कर्म करे। किसी को भी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के आदेश अथवा भगवान् के प्रतिनिधि उस आध्यात्मिक गुरु के आदेश की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। मनुष्य को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के आदेश के पालन हेतु बिना किसी हिचकिचाहट के कर्म करना चाहिए—यही उसे समस्त परिस्थितियों में सुरक्षित रखेगा।