हि

अध्याय 18 · 56 / 74

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स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥ ६० ॥

स्व-भाव-जेन—अपने ही स्वभाव से; कौन्तेय—हे कुन्तीपुत्र; निबद्धः—बद्ध; स्वेन—अपने ही; कर्मणा—कर्मों से; कर्तुम्—करने के लिए; न—नहीं; इच्छसि—चाहते; यत्—जो; मोहात्—मोह से; करिष्यसि—तुम करोगे; अवशः—विवशतापूर्वक; अपि—भी; तत्—वह।

हे कुन्तीपुत्र, मोह के वशीभूत होकर तुम इस समय मेरे निर्देश के अनुसार कर्म करने से विमुख हो रहे हो। किन्तु अपने ही स्वभाव से विवश होकर तुम वही कर्म करोगे।

यदि मनुष्य परमेश्वर के निर्देशन में कर्म करने से इन्कार करता है, तो वह उन गुणों के द्वारा कर्म करने को विवश हो जाता है, जिनमें वह स्थित है। प्रत्येक व्यक्ति प्रकृति के गुणों के किसी विशेष संयोग के वशीभूत होकर उसी रीति से कर्म कर रहा है। किन्तु जो कोई स्वेच्छा से परमेश्वर के निर्देशन में स्वयं को संलग्न करता है, वह महिमामय बन जाता है।