हि

अध्याय 18 · 57 / 74

18.61

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥ ६१ ॥

ईश्वरः—परमेश्वर; सर्व-भूतानाम्—समस्त जीवों के; हृद्-देशे—हृदय के स्थान में; अर्जुन—हे अर्जुन; तिष्ठति—निवास करते हैं; भ्रामयन्—भ्रमण कराते हुए; सर्व-भूतानि—समस्त जीवों को; यन्त्र—यन्त्र; आरूढानि—उस पर स्थित; मायया—भौतिक ऊर्जा के वशीभूत।

हे अर्जुन, परमेश्वर सबके हृदय में स्थित हैं, और समस्त जीवों के भ्रमण का निर्देशन कर रहे हैं, जो भौतिक ऊर्जा से बने एक यन्त्र पर मानो आरूढ़ हैं।

अर्जुन परम ज्ञाता नहीं था, और युद्ध करने अथवा न करने का उसका निर्णय उसकी सीमित विवेक-बुद्धि तक ही सीमित था। भगवान् श्रीकृष्ण ने उपदेश दिया कि व्यक्ति ही सर्वस्व नहीं है। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, अथवा स्वयं श्रीकृष्ण, स्थानिक परमात्मा के रूप में, हृदय में स्थित रहकर जीव का निर्देशन करते हैं। शरीर बदलने के पश्चात् जीव अपने पूर्व कर्मों को भूल जाता है, किन्तु परमात्मा, भूत, वर्तमान तथा भविष्य के ज्ञाता के रूप में, उसके समस्त कर्मों के साक्षी बने रहते हैं। अतः जीवों के समस्त कर्मों का निर्देशन इन्हीं परमात्मा के द्वारा होता है। जीव वह प्राप्त करता है जिसका वह अधिकारी है, और परमात्मा के निर्देशन में भौतिक ऊर्जा में रचित भौतिक शरीर के द्वारा वहन किया जाता है। ज्यों ही जीव किसी विशेष प्रकार के शरीर में स्थापित होता है, त्यों ही उसे उस शारीरिक स्थिति के वशीभूत होकर कर्म करना पड़ता है। तीव्र गति की मोटरकार में बैठा व्यक्ति धीमी कार में बैठे व्यक्ति की अपेक्षा अधिक तीव्र गति से जाता है, यद्यपि चालक, अर्थात् जीव, समान ही हो सकते हैं। इसी प्रकार, परमात्मा के आदेश से भौतिक प्रकृति किसी विशेष प्रकार के जीव को, उसकी पूर्व वासनाओं के अनुरूप कर्म करने हेतु, किसी विशेष प्रकार का शरीर गढ़ती है। जीव स्वतन्त्र नहीं है। मनुष्य को स्वयं को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से स्वतन्त्र नहीं मानना चाहिए। व्यक्ति सदा उनके नियन्त्रण में रहता है। अतः उसका कर्तव्य है शरणागति, और यही अगले श्लोक का आदेश है।