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अध्याय 18 · 58 / 74

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तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥ ६२ ॥

तम्—उनकी; एव—निश्चय ही; शरणम्—शरण; गच्छ—जाओ; सर्व-भावेन—सब प्रकार से; भारत—हे भरतपुत्र; तत्-प्रसादात्—उनकी कृपा से; पराम्—दिव्य; शान्तिम्—शान्ति; स्थानम्—धाम; प्राप्स्यसि—तुम प्राप्त करोगे; शाश्वतम्—नित्य।

हे भरतवंशी, सर्वथा उनकी शरण में जाओ। उनकी कृपा से तुम दिव्य शान्ति तथा परम एवं नित्य धाम को प्राप्त करोगे।

अतः जीव को सबके हृदय में स्थित पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की शरण में जाना चाहिए, और इससे वह इस भौतिक अस्तित्व के सब प्रकार के दुःखों से मुक्त हो जाएगा। ऐसी शरणागति के द्वारा वह न केवल इस जीवन के समस्त दुःखों से मुक्त होगा, अपितु अन्त में परमेश्वर तक भी पहुँच जाएगा। दिव्य जगत् का वर्णन वैदिक साहित्य में तद् विष्णोः परमं पदम् के रूप में किया गया है। चूँकि समस्त सृष्टि भगवान् का राज्य है, अतः समस्त भौतिक वस्तु वस्तुतः आध्यात्मिक है, किन्तु परमं पदम् विशेष रूप से उस नित्य धाम को इंगित करता है, जिसे आध्यात्मिक आकाश अथवा वैकुण्ठ कहा जाता है।

भगवद्गीता के पन्द्रहवें अध्याय में कहा गया है: “सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः।” भगवान् सबके हृदय में स्थित हैं, अतः यह संस्तुति कि मनुष्य को अन्तर में स्थित परमात्मा की शरण में जाना चाहिए, इसका अर्थ है कि मनुष्य को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण की शरण में जाना चाहिए। अर्जुन तो श्रीकृष्ण को पहले ही परमेश्वर के रूप में स्वीकार कर चुका है। दसवें अध्याय में उन्हें परं ब्रह्म परं धाम के रूप में स्वीकार किया गया था। अर्जुन ने श्रीकृष्ण को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् तथा समस्त जीवों के परम धाम के रूप में केवल अपने व्यक्तिगत अनुभव के कारण ही नहीं, अपितु नारद, असित, देवल तथा व्यास जैसे महान् प्रामाणिक पुरुषों के प्रमाणों के कारण भी स्वीकार किया है।