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अध्याय 18 · 59 / 74

18.63

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया ।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥ ६३ ॥

इति—इस प्रकार; ते—तुम्हें; ज्ञानम्—ज्ञान; आख्यातम्—वर्णन किया; गुह्यात्—गोपनीय; गुह्यतरम्—और भी अधिक गोपनीय; मया—मेरे द्वारा; विमृश्य—विचार करके; एतत्—उस पर; अशेषेण—पूर्णतया; यथा—जैसा तुम; इच्छसि—चाहो; तथा—वैसा; कुरु—करो।

इस प्रकार मैंने तुम्हें समस्त ज्ञानों में सर्वाधिक गोपनीय ज्ञान का वर्णन किया है। इस पर पूर्णतया विचार करो, और तत्पश्चात् जो चाहो वही करो।

भगवान् पहले ही अर्जुन को ब्रह्मभूत का ज्ञान समझा चुके हैं। जो ब्रह्मभूत अवस्था में है, वह आनन्दमय रहता है; वह न तो कभी शोक करता है, न ही किसी वस्तु की कामना करता है। यह गोपनीय ज्ञान के कारण है। श्रीकृष्ण परमात्मा का ज्ञान भी प्रकट करते हैं। यह भी ब्रह्म-ज्ञान है, ब्रह्म का ज्ञान है, किन्तु यह श्रेष्ठतर है।

यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि वह जैसा चाहे वैसा कर सकता है। भगवान् जीव की उस अल्प स्वतन्त्रता में हस्तक्षेप नहीं करते। भगवद्गीता में भगवान् ने सब प्रकार से यह समझाया है कि मनुष्य अपनी जीवन-दशा को किस प्रकार उन्नत कर सकता है। अर्जुन को दिया गया सर्वोत्तम परामर्श यही है कि वह अपने हृदय में स्थित परमात्मा की शरण में जाए। सम्यक् विवेक के द्वारा मनुष्य को परमात्मा के आदेश के अनुसार कर्म करने हेतु सहमत होना चाहिए। इससे मनुष्य को कृष्णभावनामृत में, अर्थात् मानव-जीवन की सर्वोच्च सिद्धि-अवस्था में, निरन्तर स्थित रहने में सहायता मिलेगी। अर्जुन को साक्षात् भगवान् के द्वारा युद्ध करने का आदेश दिया जा रहा है। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की शरणागति जीवों के सर्वोत्तम हित में है। यह परमेश्वर के हित में नहीं है। शरणागति से पूर्व मनुष्य जहाँ तक उसकी बुद्धि जाती है, इस विषय पर विचार करने के लिए स्वतन्त्र है; यही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के उपदेश को स्वीकार करने का सर्वोत्तम मार्ग है। ऐसा उपदेश श्रीकृष्ण के प्रामाणिक प्रतिनिधि, आध्यात्मिक गुरु, के माध्यम से भी आता है।