अध्याय 18 · 60 / 74
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सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः ।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥ ६४ ॥
सर्व-गुह्यतमम्—सर्वाधिक गोपनीय; भूयः—पुनः; शृणु—सुनो; मे—मुझसे; परमम्—परम; वचः—उपदेश; इष्टः असि—तुम मुझे अत्यन्त प्रिय हो; दृढम्—अत्यन्त; इति—इस प्रकार; ततः—इसलिए; वक्ष्यामि—कहता हूँ; ते—तुम्हारे; हितम्—हित।
चूँकि तुम मेरे अत्यन्त प्रिय मित्र हो, अतः मैं तुम्हें ज्ञान का सर्वाधिक गोपनीय अंश कह रहा हूँ। इसे मुझसे सुनो, क्योंकि यह तुम्हारे हित के लिए है।
भगवान् ने अर्जुन को सबके हृदय में स्थित परमात्मा का गोपनीय ज्ञान दिया है, और अब वे इस ज्ञान का सर्वाधिक गोपनीय अंश दे रहे हैं: केवल पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की शरण में जाओ। नवें अध्याय के अन्त में उन्होंने कहा है, “केवल सदा मेरा ही चिन्तन करो।” वही उपदेश यहाँ भगवद्गीता की शिक्षाओं के सार पर बल देने हेतु दोहराया गया है। यह सार किसी सामान्य व्यक्ति के द्वारा नहीं समझा जाता, अपितु उसके द्वारा समझा जाता है जो वास्तव में श्रीकृष्ण को अत्यन्त प्रिय है, श्रीकृष्ण का शुद्ध भक्त है। यह समस्त वैदिक साहित्य का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपदेश है। इस सन्दर्भ में श्रीकृष्ण जो कह रहे हैं, वह ज्ञान का सर्वाधिक सारभूत अंश है, और इसका पालन केवल अर्जुन के द्वारा ही नहीं, अपितु समस्त जीवों के द्वारा किया जाना चाहिए।