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अध्याय 18 · 61 / 74

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मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥ ६५ ॥

मत्-मनाः—मेरा चिन्तन करने वाले; भव—हो जाओ; मत्-भक्तः—मेरे भक्त; मत्-याजी—मेरे उपासक; माम्—मुझे; नमस्कुरु—नमस्कार करो; माम्—मुझे; एव—निश्चय ही; एष्यसि—आओगे; सत्यम्—सत्य रूप में; ते—तुमसे; प्रतिजाने—मैं प्रतिज्ञा करता हूँ; प्रियः—प्रिय; असि—तुम हो; मे—मेरे।

सदा मेरा चिन्तन करो और मेरे भक्त बन जाओ। मेरी आराधना करो और मुझे प्रणाम अर्पित करो। इस प्रकार तुम निश्चय ही मुझे प्राप्त करोगे। मैं तुमसे यह प्रतिज्ञा करता हूँ, क्योंकि तुम मेरे अत्यन्त प्रिय मित्र हो।

ज्ञान का सर्वाधिक गोपनीय अंश यही है कि मनुष्य को श्रीकृष्ण का शुद्ध भक्त बन जाना चाहिए, सदा उनका चिन्तन करना चाहिए तथा उनके लिए कर्म करना चाहिए। मनुष्य को औपचारिक ध्यानी नहीं बन जाना चाहिए। जीवन को ऐसा गढ़ा जाना चाहिए कि मनुष्य को सदा श्रीकृष्ण का चिन्तन करने का अवसर मिलता रहे। मनुष्य को सदा ऐसी रीति से कर्म करना चाहिए कि उसके समस्त दैनिक कर्म श्रीकृष्ण के साथ सम्बद्ध रहें। उसे अपने जीवन को ऐसी रीति से व्यवस्थित करना चाहिए कि चौबीसों घण्टों में वह श्रीकृष्ण के चिन्तन के बिना रह ही न सके। और भगवान् की प्रतिज्ञा यह है कि जो कोई ऐसे शुद्ध कृष्णभावनामृत में स्थित है, वह निश्चय ही श्रीकृष्ण के धाम को लौटेगा, जहाँ वह श्रीकृष्ण की आमने-सामने की संगति में संलग्न रहेगा। ज्ञान का यह सर्वाधिक गोपनीय अंश अर्जुन से इसलिए कहा गया, क्योंकि वह श्रीकृष्ण का प्रिय मित्र है। जो कोई अर्जुन के मार्ग का अनुसरण करता है, वह श्रीकृष्ण का प्रिय मित्र बन सकता है और अर्जुन के समान ही सिद्धि प्राप्त कर सकता है।

ये शब्द इस बात पर बल देते हैं कि मनुष्य को अपना मन श्रीकृष्ण पर एकाग्र करना चाहिए—वही दो भुजाओं वाला, बाँसुरी धारण किए, सुन्दर मुख तथा केशों में मयूरपंख धारण किए नीलवर्ण बालक। ब्रह्म-संहिता तथा अन्य ग्रन्थों में श्रीकृष्ण के वर्णन मिलते हैं। मनुष्य को अपना मन भगवान् के इसी आदि रूप, श्रीकृष्ण, पर स्थिर करना चाहिए। उसे अपना ध्यान भगवान् के अन्य रूपों की ओर भी विचलित नहीं करना चाहिए। भगवान् के अनेक रूप हैं, यथा विष्णु, नारायण, राम, वराह आदि, किन्तु भक्त को अपना मन उस रूप पर एकाग्र करना चाहिए जो अर्जुन के समक्ष उपस्थित था। श्रीकृष्ण के रूप पर मन की एकाग्रता ही ज्ञान का सर्वाधिक गोपनीय अंश है, और यह अर्जुन के समक्ष इसलिए प्रकट किया गया है, क्योंकि अर्जुन श्रीकृष्ण का सर्वाधिक प्रिय मित्र है।