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अध्याय 18 · 62 / 74

18.66

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ ६६ ॥

सर्व-धर्मान्—सब प्रकार के धर्म; परित्यज्य—त्याग कर; माम्—मेरी; एकम्—केवल; शरणम्—शरण; व्रज—जाओ; अहम्—मैं; त्वाम्—तुम्हें; सर्व—समस्त; पापेभ्यः—पापपूर्ण प्रतिक्रियाओं से; मोक्षयिष्यामि—मुक्त कर दूँगा; मा—मत; शुचः—चिन्ता करो।

सब प्रकार के धर्मों को त्याग कर केवल मेरी शरण में आओ। मैं तुम्हें समस्त पापपूर्ण प्रतिक्रियाओं से मुक्त कर दूँगा। भयभीत मत होओ।

भगवान् ने विविध प्रकार के ज्ञानों, धर्म की प्रक्रियाओं, परब्रह्म के ज्ञान, परमात्मा के ज्ञान, सामाजिक जीवन के विभिन्न प्रकार के आश्रमों तथा वर्णों के ज्ञान, संन्यास-आश्रम के ज्ञान, अनासक्ति के ज्ञान, इन्द्रिय तथा मन के संयम, ध्यान आदि का वर्णन किया है। उन्होंने इतने प्रकारों से विभिन्न प्रकार के धर्मों का वर्णन किया है। अब, भगवद्गीता का उपसंहार करते हुए, भगवान् कहते हैं कि अर्जुन को उन समस्त प्रक्रियाओं को त्याग देना चाहिए जो उसे समझाई गई हैं; उसे केवल श्रीकृष्ण की शरण में जाना चाहिए। वह शरणागति उसे सब प्रकार की पापपूर्ण प्रतिक्रियाओं से बचाएगी, क्योंकि भगवान् स्वयं उसकी रक्षा करने की प्रतिज्ञा करते हैं।

आठवें अध्याय में कहा गया था कि केवल वही, जो समस्त पापपूर्ण प्रतिक्रियाओं से मुक्त हो चुका है, भगवान् श्रीकृष्ण की आराधना का आश्रय ले सकता है। अतः कोई यह सोच सकता है कि जब तक वह समस्त पापपूर्ण प्रतिक्रियाओं से मुक्त नहीं हो जाता, तब तक वह शरणागति की प्रक्रिया का आश्रय नहीं ले सकता। ऐसे सन्देहों के विषय में यहाँ कहा गया है कि यदि मनुष्य समस्त पापपूर्ण प्रतिक्रियाओं से मुक्त नहीं भी है, तो भी केवल श्रीकृष्ण की शरण में जाने की प्रक्रिया से वह स्वतः मुक्त हो जाता है। पापपूर्ण प्रतिक्रियाओं से स्वयं को मुक्त करने हेतु श्रमसाध्य प्रयत्न की आवश्यकता नहीं है। मनुष्य को बिना किसी हिचकिचाहट के श्रीकृष्ण को समस्त जीवों के परम उद्धारक के रूप में स्वीकार करना चाहिए। श्रद्धा तथा प्रेम सहित उसे उनकी शरण में जाना चाहिए।

भक्ति की प्रक्रिया के अनुसार मनुष्य को केवल ऐसे धार्मिक सिद्धान्तों को स्वीकार करना चाहिए जो अन्ततः भगवान् की भक्ति की ओर ले जाएँ। मनुष्य सामाजिक व्यवस्था में अपनी स्थिति के अनुसार कोई विशेष व्यावसायिक कर्तव्य निभा सकता है, किन्तु यदि अपना कर्तव्य निभाते हुए वह कृष्णभावनामृत के बिन्दु तक नहीं पहुँचता, तो उसके समस्त कर्म व्यर्थ हैं।

जो कुछ कृष्णभावनामृत की सिद्धि-अवस्था की ओर न ले जाए, उसका त्याग कर देना चाहिए। मनुष्य को विश्वास रखना चाहिए कि समस्त परिस्थितियों में श्रीकृष्ण उसे सब प्रकार की कठिनाइयों से रक्षा करेंगे। यह सोचने की आवश्यकता नहीं कि मनुष्य अपने शरीर तथा आत्मा को किस प्रकार साथ-साथ बनाए रखे। इसकी देखभाल श्रीकृष्ण करेंगे। मनुष्य को सदा स्वयं को असहाय मानना चाहिए और श्रीकृष्ण को ही अपने जीवन की प्रगति का एकमात्र आधार मानना चाहिए। ज्यों ही मनुष्य पूर्ण कृष्णभावनामृत में भगवान् की भक्ति में गम्भीरतापूर्वक संलग्न होता है, त्यों ही वह भौतिक प्रकृति के समस्त कल्मष से मुक्त हो जाता है। धर्म की तथा ज्ञान के अनुशीलन, योगपद्धति में योगाभ्यासमय ध्यान आदि के द्वारा शुद्धिकरण की विभिन्न प्रक्रियाएँ हैं, किन्तु जो श्रीकृष्ण की शरण में जाता है, उसे इतनी सारी विधियों का पालन नहीं करना पड़ता। श्रीकृष्ण की वह सरल शरणागति उसे अनावश्यक रूप से समय गँवाने से बचा लेगी। इस प्रकार मनुष्य एक ही साथ समस्त प्रगति कर सकता है और समस्त पापपूर्ण प्रतिक्रिया से मुक्त हो सकता है।

मनुष्य को श्रीकृष्ण की सुन्दर छवि से आकृष्ट होना चाहिए। उनका नाम श्रीकृष्ण इसलिए है, क्योंकि वे सर्व-आकर्षक हैं। जो श्रीकृष्ण की सुन्दर, सर्व-शक्तिमान, सर्वसमर्थ छवि से आकृष्ट हो जाता है, वह सौभाग्यशाली है। दिव्यवादी विभिन्न प्रकार के होते हैं—उनमें से कुछ निराकार ब्रह्म की छवि के प्रति आसक्त रहते हैं, कुछ परमात्मा-पक्ष से आकृष्ट रहते हैं, आदि, किन्तु जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के साकार पक्ष से आकृष्ट होता है, और सबसे बढ़कर, जो स्वयं श्रीकृष्ण के रूप में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से आकृष्ट होता है, वही सर्वाधिक पूर्ण दिव्यवादी है। दूसरे शब्दों में, पूर्ण भावना में श्रीकृष्ण की भक्ति ज्ञान का सर्वाधिक गोपनीय अंश है, और यही समूची भगवद्गीता का सार है। कर्मयोगी, अनुभववादी दार्शनिक, योगी तथा भक्त—ये सभी दिव्यवादी कहलाते हैं, किन्तु जो शुद्ध भक्त है, वह इन सबमें श्रेष्ठ है। यहाँ प्रयुक्त विशिष्ट शब्द मा शुचः, अर्थात् “मत डरो, मत हिचकिचाओ, मत चिन्ता करो”, अत्यन्त सार्थक हैं। मनुष्य इस विषय में उलझन में पड़ सकता है कि वह सब प्रकार के धार्मिक रूपों को त्याग कर केवल श्रीकृष्ण की शरण में किस प्रकार जा सकता है, किन्तु ऐसी चिन्ता व्यर्थ है।