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अध्याय 18 · 63 / 74

18.67

इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥ ६७ ॥

इदम्—यह; ते—तुम्हें; न—कभी नहीं; अतपस्काय—जो तपस्वी नहीं है; न—कभी नहीं; अभक्ताय—जो भक्त नहीं है; कदाचन—किसी भी समय; न—कभी नहीं; च—भी; अशुश्रूषवे—जो भक्ति में संलग्न नहीं है; वाच्यम्—कहा जाना चाहिए; न—कभी नहीं; च—भी; माम्—मुझसे; यः—जो कोई; अभ्यसूयति—ईर्ष्या करता है।

यह गोपनीय ज्ञान उन्हें कभी नहीं समझाया जाना चाहिए जो न तो तपस्वी हैं, न भक्त हैं, और न ही भक्ति में संलग्न हैं, और न ही उसे जो मुझसे ईर्ष्या करता है।

जिन व्यक्तियों ने धर्म की प्रक्रिया की तपस्याएँ नहीं की हैं, जिन्होंने कभी कृष्णभावनामृत में भक्ति का प्रयत्न नहीं किया है, जिन्होंने किसी शुद्ध भक्त की सेवा-शुश्रूषा नहीं की है, और विशेष रूप से वे जो श्रीकृष्ण को एक ऐतिहासिक पुरुष के रूप में मानते हैं अथवा श्रीकृष्ण की महानता से ईर्ष्या करते हैं, उन्हें ज्ञान का यह सर्वाधिक गोपनीय अंश नहीं बताया जाना चाहिए। किन्तु यह यदा-कदा देखा जाता है कि श्रीकृष्ण से ईर्ष्या करने वाले आसुरिक व्यक्ति भी, जो श्रीकृष्ण की एक भिन्न रीति से उपासना करते हैं, व्यवसाय करने हेतु भगवद्गीता की एक भिन्न रीति से व्याख्या करने का पेशा अपना लेते हैं, किन्तु जो वास्तव में श्रीकृष्ण को समझना चाहता है, उसे भगवद्गीता पर ऐसी टीकाओं से बचना चाहिए। वस्तुतः भगवद्गीता का प्रयोजन उनके लिए बोधगम्य नहीं है, जो विषयासक्त हैं—यदि कोई विषयासक्त न भी हो किन्तु वैदिक शास्त्र में विहित अनुशासनों का कठोरता से पालन करता हो, तो भी यदि वह भक्त नहीं है, तो वह श्रीकृष्ण को नहीं समझ सकता। जब कोई स्वयं को श्रीकृष्ण का भक्त भी प्रदर्शित करे, किन्तु कृष्णभावनामय कर्मों में संलग्न न हो, तो वह भी श्रीकृष्ण को नहीं समझ सकता। ऐसे अनेक व्यक्ति हैं जो श्रीकृष्ण से ईर्ष्या करते हैं, क्योंकि उन्होंने भगवद्गीता में यह समझाया है कि वे ही परमेश्वर हैं और उनसे ऊपर अथवा उनके समान कुछ भी नहीं है। ऐसे अनेक व्यक्ति हैं जो श्रीकृष्ण से ईर्ष्या करते हैं। ऐसे व्यक्तियों को भगवद्गीता नहीं बतानी चाहिए, क्योंकि वे उसे नहीं समझ सकते। श्रद्धाहीन व्यक्तियों के द्वारा भगवद्गीता तथा श्रीकृष्ण को समझे जाने की कोई सम्भावना नहीं है। किसी शुद्ध भक्त के अधिकार से श्रीकृष्ण को समझे बिना मनुष्य को भगवद्गीता पर टीका करने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए।