हि

अध्याय 18 · 64 / 74

18.68

य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥ ६८ ॥

यः—जो कोई; इदम्—यह; परमम्—परम; गुह्यम्—गोपनीय; मत्—मेरे; भक्तेषु—भक्तों में; अभिधास्यति—समझाता है; भक्तिम्—भक्ति; मयि—मुझमें; पराम्—दिव्य; कृत्वा—करके; माम्—मुझे; एव—निश्चय ही; एष्यति—प्राप्त करता है; असंशयः—सन्देह रहित।

जो इस परम रहस्य को भक्तों के समक्ष समझाता है, उसकी भक्ति सुनिश्चित हो जाती है, और अन्त में वह मेरे पास लौट आएगा।

सामान्यतः यह परामर्श दिया जाता है कि भगवद्गीता की चर्चा केवल भक्तों के मध्य ही की जाए, क्योंकि जो भक्त नहीं हैं, वे न तो श्रीकृष्ण को समझेंगे और न ही भगवद्गीता को। जो श्रीकृष्ण को उनके यथार्थ रूप में तथा भगवद्गीता को उसके यथार्थ रूप में स्वीकार नहीं करते, उन्हें भगवद्गीता की स्वेच्छाचारितापूर्वक व्याख्या करके अपराधी नहीं बनना चाहिए। भगवद्गीता उन व्यक्तियों को समझाई जानी चाहिए जो श्रीकृष्ण को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में स्वीकार करने हेतु तैयार हैं। यह केवल भक्तों के लिए विषय है, दार्शनिक कल्पनावादियों के लिए नहीं। किन्तु जो कोई भगवद्गीता को उसके यथार्थ रूप में प्रस्तुत करने का निष्ठापूर्वक प्रयत्न करता है, वह भक्तिमय कर्मों में उन्नत होगा और जीवन की शुद्ध भक्ति-अवस्था को प्राप्त करेगा। ऐसी शुद्ध भक्ति के फलस्वरूप वह निश्चय ही भगवद्धाम को, भगवान् के पास, लौटेगा।