अध्याय 18 · 65 / 74
18.69
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥ ६९ ॥
न—कभी नहीं; च—और; तस्मात्—इसलिए; मनुष्येषु—मनुष्यों में; कश्चित्—कोई; मे—मेरा; प्रिय-कृत्तमः—अधिक प्रिय; भविता—होगा; न—नहीं; च—और; मे—मुझे; तस्मात्—उससे; अन्यः—अन्य; प्रियतरः—अधिक प्रिय; भुवि—इस संसार में।
इस संसार में उससे अधिक प्रिय मेरा कोई सेवक नहीं है, और न ही कभी उससे अधिक प्रिय कोई होगा।