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अध्याय 18 · 66 / 74

18.70

अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥ ७० ॥

अध्येष्यते—अध्ययन करेगा; च—भी; यः—जो; इमम्—इस; धर्म्यम्—पवित्र; संवादम्—संवाद का; आवयोः—हम दोनों के; ज्ञान—ज्ञान; यज्ञेन—यज्ञ से; तेन—उसके द्वारा; अहम्—मैं; इष्टः—पूजित; स्याम्—होऊँगा; इति—इस प्रकार; मे—मेरा; मतिः—मत।

और मैं घोषित करता हूँ कि जो इस पवित्र संवाद का अध्ययन करता है, वह अपनी बुद्धि के द्वारा मेरी आराधना करता है।