हि

अध्याय 18 · 68 / 74

18.72

कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा ।
कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रणष्टस्ते धनञ्जय ॥ ७२ ॥

कच्चित्—क्या; एतत्—यह; श्रुतम्—सुना गया; पार्थ—हे पृथापुत्र; त्वया—तुम्हारे द्वारा; एकाग्रेण—पूर्ण ध्यान से; चेतसा—मन से; कच्चित्—क्या; अज्ञान—अज्ञान; सम्मोहः—मोह; प्रणष्टः—दूर हुआ; ते—तुम्हारा; धनञ्जय—हे धनञ्जय (अर्जुन)।

हे धनञ्जय अर्जुन, क्या तुमने इसे अपने मन से एकाग्र होकर सुना? और क्या अब तुम्हारे मोह तथा अज्ञान दूर हो गए?

भगवान् अर्जुन के आध्यात्मिक गुरु के रूप में कार्य कर रहे थे। अतः अर्जुन से यह पूछना उनका कर्तव्य था कि क्या उसने समूची भगवद्गीता को उसके यथार्थ परिप्रेक्ष्य में समझा। यदि नहीं, तो भगवान् किसी भी बिन्दु को, अथवा आवश्यकता पड़ने पर समूची भगवद्गीता को, पुनः समझाने के लिए तत्पर थे। वस्तुतः जो कोई श्रीकृष्ण अथवा उनके प्रतिनिधि जैसे प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु से भगवद्गीता सुनता है, वह पाएगा कि उसका समस्त अज्ञान दूर हो जाता है। भगवद्गीता किसी कवि अथवा कथा-लेखक द्वारा लिखी गई कोई साधारण पुस्तक नहीं है; इसे साक्षात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कहते हैं। कोई भी व्यक्ति, यदि वह इतना सौभाग्यशाली हो कि इन शिक्षाओं को श्रीकृष्ण से अथवा उनके प्रामाणिक आध्यात्मिक प्रतिनिधि से सुने, तो वह निश्चय ही मुक्त पुरुष बन जाता है और अज्ञान के अन्धकार से बाहर निकल आता है।