हि

अध्याय 18 · 69 / 74

18.73

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥ ७३ ॥

अर्जुनः उवाच—अर्जुन ने कहा; नष्टः—दूर हुआ; मोहः—मोह; स्मृतिः—स्मृति; लब्धा—पुनः प्राप्त की; त्वत्-प्रसादात्—आपकी कृपा से; मया—मेरे द्वारा; अच्युत—हे अच्युत श्रीकृष्ण; स्थितः—स्थित; अस्मि—हूँ; गत—दूर हुए; सन्देहः—समस्त सन्देह; करिष्ये—मैं सम्पन्न करूँगा; वचनम्—आज्ञा; तव—आपकी।

अर्जुन ने कहा : हे प्रिय श्रीकृष्ण, हे अच्युत, अब मेरा मोह दूर हो गया है। आपकी कृपा से मैंने अपनी स्मृति पुनः प्राप्त कर ली है, और अब मैं दृढ़ तथा सन्देहरहित हूँ और आपके निर्देशों के अनुसार कार्य करने के लिए तत्पर हूँ।

अर्जुन द्वारा प्रतिनिधित्व किए गए जीव की स्वरूपगत स्थिति यह है कि उसे परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार कार्य करना होता है। वह आत्मानुशासन के लिए बना है। श्रीचैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि जीव की वास्तविक स्थिति परमेश्वर के नित्य सेवक की है। इस सिद्धान्त को भुलाकर जीव भौतिक प्रकृति से बद्ध हो जाता है, किन्तु परमेश्वर की सेवा करते हुए वह भगवान् का मुक्त सेवक बन जाता है। जीव की स्वरूपगत स्थिति सेवक की है; उसे या तो मायारूपी भ्रम की सेवा करनी है, या परमेश्वर की। यदि वह परमेश्वर की सेवा करता है, तो वह अपनी स्वाभाविक अवस्था में है, किन्तु यदि वह मायारूपी बहिरंगा शक्ति की सेवा करना पसन्द करता है, तो निश्चय ही वह बन्धन में रहेगा। मोह में जीव इस भौतिक जगत् में सेवा कर रहा है। वह अपने काम तथा इच्छाओं से बँधा है, फिर भी अपने को जगत् का स्वामी मानता है। इसी को मोह कहते हैं। जब कोई व्यक्ति मुक्त होता है, तब उसका मोह समाप्त हो जाता है, और वह स्वेच्छा से परमेश्वर के प्रति आत्मसमर्पण कर देता है ताकि उनकी इच्छानुसार कार्य कर सके। अन्तिम मोह, जीव को फँसाने का मायारूपी अन्तिम जाल, यह प्रस्ताव है कि वह स्वयं ईश्वर है। जीव सोचता है कि वह अब बद्ध आत्मा नहीं, अपितु ईश्वर है। वह इतना अल्पबुद्धि है कि यह नहीं सोचता कि यदि वह ईश्वर होता, तो वह सन्देह में कैसे रहता? इस पर वह विचार नहीं करता। अतः यही मोह का अन्तिम जाल है। वस्तुतः मायारूपी शक्ति से मुक्त होने का अर्थ है पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण को समझना तथा उनकी आज्ञानुसार कार्य करने के लिए सहमत होना। इस श्लोक में मोहः शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। मोहः उसकी ओर संकेत करता है, जो ज्ञान के विपरीत है। वास्तव में वास्तविक ज्ञान यह बोध है कि प्रत्येक जीव नित्य रूप से भगवान् का सेवक है, किन्तु अपने को उस स्थिति में मानने के बजाय जीव यह सोचता है कि वह सेवक नहीं, अपितु इस भौतिक जगत् का स्वामी है, क्योंकि वह भौतिक प्रकृति पर प्रभुत्व जमाना चाहता है। यही उसका मोह है। यह मोह भगवान् की कृपा से अथवा किसी शुद्ध भक्त की कृपा से दूर किया जा सकता है। जब वह मोह समाप्त हो जाता है, तब मनुष्य कृष्णभावनामृत में कार्य करने के लिए सहमत हो जाता है।

कृष्णभावनामृत श्रीकृष्ण की आज्ञा के अनुसार कार्य करना है। पदार्थ की बहिरंगा शक्ति से मोहित बद्ध आत्मा यह नहीं जानती कि परमेश्वर वह स्वामी हैं जो ज्ञान से परिपूर्ण हैं और जो सबके स्वामी हैं। वे जो भी चाहें, अपने भक्तों को प्रदान कर सकते हैं; वे सबके मित्र हैं, और अपने भक्त के प्रति विशेष रूप से अनुरक्त हैं। वे इस भौतिक प्रकृति तथा समस्त जीवों के नियन्ता हैं। वे अक्षय काल के भी नियन्ता हैं, और समस्त ऐश्वर्यों तथा समस्त शक्तियों से परिपूर्ण हैं। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् भक्त को स्वयं अपने आप को भी प्रदान कर सकते हैं। जो उन्हें नहीं जानता, वह मोह के वशीभूत है; वह भक्त नहीं, अपितु माया का सेवक बन जाता है। किन्तु अर्जुन, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से भगवद्गीता सुनने के पश्चात्, समस्त मोह से मुक्त हो गया। वह समझ सका कि श्रीकृष्ण केवल उसके मित्र ही नहीं, अपितु पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। और उसने श्रीकृष्ण को यथार्थ रूप में समझ लिया। अतः भगवद्गीता का अध्ययन करना श्रीकृष्ण को यथार्थ रूप में समझना है। जब कोई व्यक्ति पूर्ण ज्ञान में होता है, तब वह स्वाभाविक रूप से श्रीकृष्ण के प्रति आत्मसमर्पण कर देता है। जब अर्जुन यह समझ गया कि जनसंख्या की अनावश्यक वृद्धि को घटाना श्रीकृष्ण की योजना है, तब वह श्रीकृष्ण की इच्छानुसार युद्ध करने के लिए सहमत हो गया। उसने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की आज्ञा के अधीन युद्ध करने हेतु पुनः अपने अस्त्र—अपने बाण तथा धनुष—उठा लिए।