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अध्याय 18 · 70 / 74

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इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ।
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥ ७४ ॥

सञ्जयः उवाच—सञ्जय ने कहा; इति—इस प्रकार; अहम्—मैंने; वासुदेवस्य—श्रीकृष्ण के; पार्थस्य—अर्जुन के; च—भी; महात्मनः—दो महान् आत्माओं के; संवादम्—संवाद को; इमम्—इस; अश्रौषम्—सुना; अद्भुतम्—आश्चर्य; रोमहर्षणम्—रोमांचकारी।

सञ्जय ने कहा : इस प्रकार मैंने दो महान् आत्माओं, श्रीकृष्ण तथा अर्जुन का संवाद सुना। और वह सन्देश इतना अद्भुत है कि मेरे रोंगटे खड़े हो रहे हैं।

भगवद्गीता के आरम्भ में धृतराष्ट्र ने अपने सचिव सञ्जय से पूछा, “कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में क्या हुआ?” समूचा वृत्तान्त सञ्जय के आध्यात्मिक गुरु व्यास की कृपा से उसके हृदय में संप्रेषित हुआ। इस प्रकार उसने युद्धक्षेत्र के विषय की व्याख्या की। यह संवाद अद्भुत था, क्योंकि दो महान् आत्माओं के बीच ऐसा महत्त्वपूर्ण संवाद न तो पहले कभी हुआ और न ही पुनः कभी होगा। यह इसलिए अद्भुत है, क्योंकि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् जीव अर्जुन को, जो भगवान् का एक महान् भक्त है, अपने तथा अपनी शक्तियों के विषय में बता रहे हैं। यदि हम श्रीकृष्ण को समझने हेतु अर्जुन के पदचिह्नों का अनुसरण करें, तो हमारा जीवन सुखमय तथा सफल होगा। सञ्जय ने इसका अनुभव किया, और ज्यों-ज्यों वह इसे समझने लगा, उसने धृतराष्ट्र को यह संवाद सुनाया। अब यह निष्कर्ष निकलता है कि जहाँ श्रीकृष्ण तथा अर्जुन हैं, वहाँ विजय है।