अध्याय 2 · 11 / 71
2.11
श्री भगवानुवाच
अशोच्यनन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥ ११ ॥
श्री भगवान् उवाच—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने कहा; अशोच्यान्—जो शोक के योग्य नहीं है; अन्वशोचः—तुम शोक कर रहे हो; त्वम्—तुम; प्रज्ञा-वादाः—विद्वत्तापूर्ण वचन; च—भी; भाषसे—बोलते हुए; गत—गई हुई; असून्—प्राण; अगत—न बीती हुई; असून्—प्राण; च—भी; न—कभी नहीं; अनुशोचन्ति—शोक करते हैं; पण्डिताः—विद्वान्।
श्रीभगवान् ने कहा : विद्वत्तापूर्ण वचन कहते हुए भी तुम उसके लिए शोक कर रहे हो जो शोक के योग्य नहीं है। जो ज्ञानी हैं, वे न तो जीवितों के लिए शोक करते हैं और न मृतकों के लिए।
भगवान् ने तत्काल गुरु का स्थान ग्रहण किया और शिष्य का तिरस्कार करते हुए, अप्रत्यक्ष रूप से उसे मूर्ख कहा। भगवान् ने कहा, तुम विद्वान् मनुष्य की भाँति बात कर रहे हो, किन्तु तुम यह नहीं जानते कि जो विद्वान् है—जो जानता है कि शरीर क्या है और आत्मा क्या है—वह शरीर की किसी भी अवस्था के लिए शोक नहीं करता, न जीवित अवस्था में और न मृत अवस्था में। जैसा कि आगे के अध्यायों में समझाया जाएगा, यह स्पष्ट हो जाएगा कि ज्ञान का अर्थ है पदार्थ तथा आत्मा को, और दोनों के नियन्ता को जानना। अर्जुन ने तर्क दिया कि धार्मिक सिद्धान्तों को राजनीति अथवा समाजशास्त्र की अपेक्षा अधिक महत्त्व दिया जाना चाहिए, किन्तु वे यह नहीं जानते थे कि पदार्थ, आत्मा तथा परमेश्वर का ज्ञान धार्मिक विधि-विधानों से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। और चूँकि उनमें उस ज्ञान का अभाव था, अतः उन्हें स्वयं को अत्यन्त विद्वान् मनुष्य के रूप में प्रस्तुत नहीं करना चाहिए था। चूँकि वे अत्यन्त विद्वान् मनुष्य नहीं थे, अतएव वे ऐसी वस्तु के लिए शोक कर रहे थे जो शोक के योग्य नहीं थी। शरीर जन्म लेता है और आज अथवा कल नष्ट होने को बाध्य है; अतः शरीर उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है जितनी आत्मा। जो यह जानता है, वही वास्तव में विद्वान् है, और उसके लिए शोक का कोई कारण नहीं है, भौतिक शरीर की अवस्था चाहे जो भी हो।