हि

अध्याय 2 · 12 / 71

2.12

न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
न चैव नभविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥ १२ ॥

न—कभी नहीं; तु—किन्तु; एव—निश्चय ही; अहम्—मैं; जातु—कभी; न—कभी नहीं; आसम्—विद्यमान था; न—ऐसा नहीं है; त्वम्—तुम; न—नहीं; इमे—ये सब; जनाधिपाः—राजा; न—कभी नहीं; च—भी; एव—निश्चय ही; न—ऐसा नहीं; भविष्यामः—विद्यमान रहेंगे; सर्वे—हम सब; वयम्—हम; अतः परम्—इसके पश्चात्।

ऐसा कभी नहीं था जब मैं विद्यमान न रहा होऊँ, न तुम, न ये समस्त राजा; और न ही भविष्य में हममें से कोई विद्यमान रहना बन्द करेगा।

वेदों में, कठोपनिषद् में तथा श्वेताश्वतर उपनिषद् में भी कहा गया है कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् असंख्य जीवों के, उनके व्यक्तिगत कर्म तथा कर्म-प्रतिक्रिया के अनुसार उनकी भिन्न-भिन्न स्थितियों में, पालनकर्ता हैं। वही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् अपने पूर्ण अंशों के द्वारा प्रत्येक जीव के हृदय में भी विद्यमान हैं। केवल वे साधु पुरुष, जो भीतर तथा बाहर एक ही परमेश्वर को देख सकते हैं, वास्तव में पूर्ण तथा नित्य शान्ति प्राप्त कर सकते हैं।

nityo nityānāṁ cetanaś cetanānām

eko bahūnāṁ yo vidadhāti kāmān

tam ātmasthaṁ ye ‘nupaśyanti dhīrās

teṣāṁ śāntiḥ śāśvatī netareṣām.

(कठ 2.2.13)

जो वही वैदिक सत्य अर्जुन को दिया गया, वह संसार के उन समस्त व्यक्तियों को भी दिया गया है, जो स्वयं को अत्यन्त विद्वान् के रूप में प्रस्तुत करते हैं, किन्तु वस्तुतः जिनके पास ज्ञान का अत्यल्प कोष है। भगवान् स्पष्ट रूप से कहते हैं कि स्वयं वे, अर्जुन, तथा युद्धभूमि पर एकत्र समस्त राजा नित्य व्यष्टि सत्ताएँ हैं, और भगवान् नित्य रूप से व्यष्टि जीवों के, उनकी बद्ध तथा मुक्त दोनों स्थितियों में, पालनकर्ता हैं। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् परम व्यष्टि पुरुष हैं, तथा अर्जुन, भगवान् के नित्य पार्षद, और वहाँ एकत्र समस्त राजा व्यष्टि, नित्य पुरुष हैं। ऐसा नहीं है कि वे भूतकाल में व्यष्टि के रूप में विद्यमान नहीं थे, और ऐसा भी नहीं है कि वे नित्य पुरुष नहीं रहेंगे। उनकी व्यष्टिता भूतकाल में विद्यमान थी, और उनकी व्यष्टिता भविष्य में भी अविच्छिन्न रूप से बनी रहेगी। अतः किसी के लिए भी शोक का कोई कारण नहीं है।

मायावादी सिद्धान्त, कि मुक्ति के पश्चात् माया अथवा भ्रम के आवरण से पृथक् हुई व्यष्टि आत्मा निराकार ब्रह्म में लीन हो जाएगी और अपना व्यष्टि अस्तित्व खो देगी, परम प्रमाण भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा यहाँ समर्थित नहीं है। न ही यह सिद्धान्त यहाँ समर्थित है कि हम व्यष्टिता के विषय में केवल बद्ध अवस्था में सोचते हैं। श्रीकृष्ण यहाँ स्पष्ट रूप से कहते हैं कि भविष्य में भी भगवान् तथा अन्यों की व्यष्टिता, जैसा कि उपनिषदों में पुष्ट है, नित्य रूप से बनी रहेगी। श्रीकृष्ण का यह कथन प्रामाणिक है, क्योंकि श्रीकृष्ण भ्रम के अधीन नहीं हो सकते। यदि व्यष्टिता तथ्य न होती, तो श्रीकृष्ण इस पर इतना बल न देते—भविष्य के लिए भी। मायावादी यह तर्क दे सकता है कि श्रीकृष्ण द्वारा कही गई व्यष्टिता आध्यात्मिक नहीं, अपितु भौतिक है। यदि इस तर्क को भी स्वीकार कर लिया जाए कि व्यष्टिता भौतिक है, तो फिर श्रीकृष्ण की व्यष्टिता का विभेद कोई कैसे कर सकता है? श्रीकृष्ण भूतकाल में अपनी व्यष्टिता की पुष्टि करते हैं और भविष्य में भी अपनी व्यष्टिता की पुष्टि करते हैं। उन्होंने अनेक प्रकार से अपनी व्यष्टिता की पुष्टि की है, और निराकार ब्रह्म को उनसे अधीनस्थ घोषित किया गया है। श्रीकृष्ण ने सर्वदा आध्यात्मिक व्यष्टिता बनाए रखी है; यदि उन्हें व्यष्टि चेतना में एक साधारण बद्ध आत्मा के रूप में स्वीकार किया जाए, तो उनकी भगवद्गीता का प्रामाणिक शास्त्र के रूप में कोई मूल्य नहीं रहता। मानवीय दुर्बलता के चारों दोषों से युक्त साधारण मनुष्य उसका उपदेश नहीं दे सकता जो सुनने योग्य हो। गीता ऐसे साहित्य से ऊपर है। कोई सांसारिक ग्रन्थ भगवद्गीता की तुलना नहीं कर सकता। जब कोई श्रीकृष्ण को साधारण मनुष्य के रूप में स्वीकार करता है, तब गीता अपना समस्त महत्त्व खो देती है। मायावादी यह तर्क देता है कि इस श्लोक में उल्लिखित बहुत्व रूढ़िगत है और वह शरीर की ओर संकेत करता है। किन्तु इस श्लोक से पूर्व ऐसी देहधारणा की पहले ही निन्दा की जा चुकी है। जीवों की देहधारणा की निन्दा करने के पश्चात्, श्रीकृष्ण के लिए पुनः शरीर पर एक रूढ़िगत प्रस्ताव रखना कैसे सम्भव था? अतएव व्यष्टिता आध्यात्मिक आधारों पर बनी रहती है और इस प्रकार श्री रामानुज जैसे महान् आचार्यगण तथा अन्यों द्वारा इसकी पुष्टि होती है। गीता में अनेक स्थानों पर स्पष्ट रूप से उल्लिखित है कि इस आध्यात्मिक व्यष्टिता को वे ही समझते हैं जो भगवान् के भक्त हैं। जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में श्रीकृष्ण से द्वेष करते हैं, उनकी इस महान् साहित्य तक कोई प्रामाणिक पहुँच नहीं है। गीता की शिक्षाओं के प्रति अभक्त का दृष्टिकोण कुछ-कुछ मधु की बोतल को चाटते हुए भौंरों के समान है। जब तक कोई बोतल को नहीं खोलता, तब तक वह मधु का स्वाद नहीं ले सकता। इसी प्रकार, भगवद्गीता का रहस्यवाद केवल भक्तगण ही समझ सकते हैं, और कोई अन्य इसका स्वाद नहीं ले सकता, जैसा कि ग्रन्थ के चतुर्थ अध्याय में कहा गया है। न ही गीता को वे व्यक्ति स्पर्श कर सकते हैं, जो भगवान् के अस्तित्व से ही द्वेष करते हैं। अतएव गीता की मायावादी व्याख्या समूचे सत्य का सर्वाधिक भ्रामक प्रस्तुतीकरण है। भगवान् चैतन्य ने हमें मायावादियों द्वारा की गई टीकाओं को पढ़ने से मना किया है और चेतावनी देते हैं कि जो मायावादी दर्शन की ऐसी समझ को अपनाता है, वह गीता के वास्तविक रहस्य को समझने की समस्त शक्ति खो देता है। यदि व्यष्टिता आनुभविक विश्व की ओर संकेत करती है, तो भगवान् द्वारा उपदेश देने की कोई आवश्यकता नहीं है। व्यष्टि आत्मा तथा भगवान् का बहुत्व एक नित्य तथ्य है, और वेदों द्वारा इसकी पुष्टि होती है, जैसा ऊपर उल्लिखित है।