अध्याय 2 · 13 / 71
2.13
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥ १३ ॥
देहिनः—देहधारी का; अस्मिन्—इस; यथा—जिस प्रकार; देहे—शरीर में; कौमारम्—बाल्यावस्था; यौवनम्—यौवन; जरा—वृद्धावस्था; तथा—उसी प्रकार; देहान्तर—शरीर का परिवर्तन; प्राप्तिः—प्राप्ति; धीरः—धीर पुरुष; तत्र—उस विषय में; न—कभी नहीं; मुह्यति—मोहित होता है।
जिस प्रकार देहधारी आत्मा इस शरीर में निरन्तर बाल्यावस्था से यौवन तथा यौवन से वृद्धावस्था को प्राप्त होती है, उसी प्रकार आत्मा मृत्यु के समय दूसरे शरीर में चली जाती है। आत्म-साक्षात्कारी आत्मा ऐसे परिवर्तन से मोहित नहीं होती।
चूँकि प्रत्येक जीव एक व्यष्टि आत्मा है, अतः प्रत्येक प्रति क्षण अपना शरीर बदल रहा है, और कभी बालक के रूप में, कभी युवक के रूप में, तथा कभी वृद्ध के रूप में प्रकट होता है। फिर भी वही आत्मा वहाँ विद्यमान रहती है और किसी परिवर्तन से नहीं गुजरती। यह व्यष्टि आत्मा अन्ततः मृत्यु के समय शरीर बदलती है और दूसरे शरीर में संक्रमण करती है; और चूँकि अगले जन्म में उसका दूसरा शरीर—भौतिक अथवा आध्यात्मिक—होना निश्चित है, अतः मृत्यु के कारण अर्जुन को शोक का कोई कारण नहीं था, न भीष्म के लिए और न द्रोण के लिए, जिनके विषय में वे इतने चिन्तित थे। अपितु उन्हें उनके शरीरों के पुराने से नए हो जाने पर हर्षित होना चाहिए था, जिससे उनकी ऊर्जा पुनर्नवीन हो जाती। शरीर के ऐसे परिवर्तन जीवन में मनुष्य के कर्म के अनुसार भोग अथवा कष्ट की विविधताओं का कारण बनते हैं। अतः भीष्म तथा द्रोण, उदार आत्माएँ होने के कारण, अगले जीवन में निश्चय ही या तो आध्यात्मिक शरीर प्राप्त करने वाले थे, अथवा कम से कम भौतिक अस्तित्व के श्रेष्ठ भोग हेतु स्वर्गीय शरीरों में जीवन। अतः किसी भी स्थिति में, शोक का कोई कारण नहीं था।
जिस किसी मनुष्य को व्यष्टि आत्मा, परमात्मा तथा प्रकृति—भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों—के स्वरूप का पूर्ण ज्ञान है, उसे धीर अथवा अत्यन्त गम्भीर मनुष्य कहा जाता है। ऐसा मनुष्य शरीर के परिवर्तन से कभी मोहित नहीं होता। आत्मा की एकता का मायावादी सिद्धान्त इस आधार पर स्वीकार नहीं किया जा सकता कि आत्मा को एक अंशभूत भाग के रूप में टुकड़ों में नहीं काटा जा सकता। भिन्न-भिन्न व्यष्टि आत्माओं में ऐसा विभाजन परमेश्वर को विभाज्य अथवा परिवर्तनशील बना देगा, जो परमात्मा के अपरिवर्तनशील होने के सिद्धान्त के विरुद्ध है।
जैसा कि गीता में पुष्ट है, परमेश्वर के अंशभूत भाग नित्य (सनातन) रूप से विद्यमान रहते हैं और उन्हें क्षर कहा जाता है; अर्थात् उनमें भौतिक प्रकृति में गिर जाने की प्रवृत्ति होती है। ये अंशभूत भाग नित्य रूप से ऐसे ही हैं, और मुक्ति के पश्चात् भी व्यष्टि आत्मा वही—अंशभूत—बनी रहती है। किन्तु एक बार मुक्त हो जाने पर, वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के साथ आनन्द तथा ज्ञान में नित्य जीवन व्यतीत करती है। प्रतिबिम्ब का सिद्धान्त परमात्मा पर लागू किया जा सकता है, जो प्रत्येक व्यष्टि शरीर में विद्यमान हैं और परमात्मा नाम से विख्यात हैं, जो व्यष्टि जीव से भिन्न हैं। जब आकाश जल में प्रतिबिम्बित होता है, तो प्रतिबिम्ब सूर्य तथा चन्द्रमा और तारों को भी प्रदर्शित करते हैं। तारों की तुलना जीवों से, तथा सूर्य अथवा चन्द्रमा की तुलना परमेश्वर से की जा सकती है। व्यष्टि अंशभूत आत्मा का प्रतिनिधित्व अर्जुन करते हैं, और परमात्मा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण हैं। वे एक ही स्तर पर नहीं हैं, जैसा कि चतुर्थ अध्याय के आरम्भ में स्पष्ट होगा। यदि अर्जुन श्रीकृष्ण के समान स्तर पर हों, और श्रीकृष्ण अर्जुन से श्रेष्ठ न हों, तो उपदेशक तथा उपदेश पाने वाले का उनका सम्बन्ध निरर्थक हो जाता है। यदि वे दोनों ही माया (भ्रामक शक्ति) द्वारा मोहित हों, तो फिर एक के उपदेशक तथा दूसरे के उपदेश-ग्राही होने की कोई आवश्यकता नहीं रहती। ऐसा उपदेश निरर्थक होगा, क्योंकि माया के बन्धन में कोई भी प्रामाणिक उपदेशक नहीं हो सकता। ऐसी परिस्थितियों में, यह स्वीकार किया जाता है कि भगवान् श्रीकृष्ण परमेश्वर हैं, जो जीव अर्जुन से, जो माया द्वारा मोहित एक विस्मृत आत्मा है, श्रेष्ठ स्थिति में हैं।