हि

अध्याय 2 · 14 / 71

2.14

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥ १४ ॥

मात्रा—इन्द्रियानुभूति; स्पर्शाः—अनुभूति; तु—केवल; कौन्तेय—हे कुन्तीपुत्र; शीत—शीतकाल; उष्ण—ग्रीष्मकाल; सुख—सुख; दुःख-दाः—दुःख देने वाले; आगम—प्रकट होने वाले; अपायिनः—लुप्त होने वाले; अनित्याः—अनित्य; तान्—उन सबको; तितिक्षस्व—सहन करने का प्रयत्न करो; भारत—हे भरतवंशी।

हे कुन्तीपुत्र, सुख और दुःख का अनित्य प्रकट होना तथा यथासमय उनका लुप्त हो जाना शीत और ग्रीष्म ऋतुओं के आने-जाने के समान है। हे भरतवंश के वंशज, ये इन्द्रियानुभूति से उत्पन्न होते हैं, और मनुष्य को बिना विचलित हुए इन्हें सहन करना सीखना चाहिए।

कर्तव्य के समुचित पालन में मनुष्य को सुख और दुःख के अनित्य आगमन तथा प्रस्थान को सहन करना सीखना पड़ता है। वैदिक विधान के अनुसार मनुष्य को माघ मास (जनवरी-फरवरी) में भी प्रातःकाल ही स्नान करना होता है। उस समय अत्यधिक शीत होता है, तथापि जो धार्मिक सिद्धान्तों का पालन करता है, वह स्नान करने में संकोच नहीं करता। इसी प्रकार स्त्री मई और जून के मासों में, जो ग्रीष्म ऋतु का सर्वाधिक तप्त भाग होता है, रसोईघर में पाक बनाने में संकोच नहीं करती। मनुष्य को जलवायु की असुविधाओं के बावजूद अपना कर्तव्य सम्पन्न करना होता है। इसी प्रकार युद्ध करना क्षत्रियों का धार्मिक सिद्धान्त है, और यद्यपि किसी मित्र अथवा सम्बन्धी से युद्ध करना पड़े, तथापि मनुष्य को अपने विहित कर्तव्य से विचलित नहीं होना चाहिए। ज्ञान की भूमि तक उठने के लिए मनुष्य को धार्मिक सिद्धान्तों के विहित नियमों एवं विधियों का पालन करना चाहिए, क्योंकि ज्ञान और भक्ति के द्वारा ही मनुष्य स्वयं को माया (भ्रम) के बन्धन से मुक्त कर सकता है।

अर्जुन को दिए गए दो भिन्न सम्बोधन भी सार्थक हैं। उन्हें कौन्तेय कहकर सम्बोधित करना उनके माता की ओर से उच्च रक्त-सम्बन्ध को इंगित करता है; और भारत कहकर सम्बोधित करना उनके पिता की ओर से उनकी महानता को इंगित करता है। दोनों ही ओर से उनकी महान् वंश-परम्परा मानी जाती है। महान् वंश-परम्परा कर्तव्यों के समुचित पालन में उत्तरदायित्व लाती है; अतः वे युद्ध से विमुख नहीं हो सकते।