अध्याय 2 · 15 / 71
2.15
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ १५ ॥
यम्—जिसे; हि—निश्चय ही; न—कभी नहीं; व्यथयन्ति—व्यथित करते हैं; एते—ये सब; पुरुषम्—पुरुष को; पुरुषर्षभ—हे पुरुषश्रेष्ठ; सम—अविचलित; दुःख—दुःख; सुखम्—सुख; धीरम्—धैर्यवान्; सः—वह; अमृतत्वाय—मुक्ति हेतु; कल्पते—योग्य माना जाता है।
हे पुरुषश्रेष्ठ [अर्जुन], जो पुरुष सुख और दुःख से विचलित नहीं होता और दोनों में स्थिर रहता है, वह निश्चय ही मुक्ति के योग्य है।
जो कोई आध्यात्मिक अनुभूति की उन्नत अवस्था के प्रति अपने संकल्प में स्थिर रहता है और सुख-दुःख के आघातों को समान रूप से सहन कर सकता है, वह निश्चय ही मुक्ति के योग्य पुरुष है। वर्णाश्रम संस्था में जीवन की चतुर्थ अवस्था, अर्थात् संन्यास आश्रम, एक कष्टसाध्य स्थिति है। किन्तु जो अपने जीवन को पूर्ण बनाने के विषय में गम्भीर है, वह समस्त कठिनाइयों के बावजूद निश्चय ही संन्यास आश्रम को ग्रहण कर लेता है। ये कठिनाइयाँ प्रायः पारिवारिक सम्बन्धों को तोड़ने, पत्नी और सन्तानों के सम्बन्ध को त्यागने से उत्पन्न होती हैं। किन्तु यदि कोई ऐसी कठिनाइयों को सहन करने में समर्थ हो, तो निश्चय ही आध्यात्मिक अनुभूति की ओर उसका मार्ग पूर्ण हो जाता है। इसी प्रकार अर्जुन को क्षत्रिय के रूप में अपने कर्तव्यों के पालन में दृढ़ रहने का परामर्श दिया गया है, भले ही अपने परिजनों अथवा इसी प्रकार के प्रियजनों से युद्ध करना कठिन हो। भगवान् चैतन्य ने चौबीस वर्ष की आयु में संन्यास ग्रहण किया, और उनके आश्रित—युवा पत्नी तथा वृद्धा माता—की देखभाल करने वाला अन्य कोई न था। तथापि एक उच्चतर उद्देश्य के लिए उन्होंने संन्यास ग्रहण किया और उच्चतर कर्तव्यों के पालन में स्थिर रहे। भौतिक बन्धन से मुक्ति प्राप्त करने का यही मार्ग है।